-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

अमेरिका स्वयं को दुनिया का सबसे विकसित और सबसे बड़ा लोकतांत्रिक समाज बताता है। वह मानवाधिकार, समानता और बहुसांस्कृतिक समाज की बात भी करता है, विश्व में जहां भी अमेरिका अपनी सैन्य कार्रवाई करता है, वहां इस कार्रवाई किए जाने का कारण भी वहां के समाज पर हो रहे अत्याचार को ही अक्सर बताता है पर आज अमेरिका में ही पिछले एक दशक में भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ सामने आई हिंसक घटनाओं की लंबी श्रृंखला उसकी इस छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
साल 2016 से 2026 के बीच अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ 41 बड़ी गंभीर घटनाएँ दर्ज की गई हैं। इनमें से 38 मामलों में भारतीय मूल के लोगों की मौत हुई है और 3 मामलों में लोग गंभीर हमलों से बच गए। इन घटनाओं में गोलीबारी, लूटपाट, अपहरण, संदिग्ध मौतें, सड़क दुर्घटनाएँ और नस्लीय घृणा से जुड़े हमले शामिल हैं। वस्तुत: हाल ही में 1 मार्च 2026 को टेक्सास के ऑस्टिन में हुई गोलीबारी में 21 वर्षीय भारतीय मूल की छात्रा सविता शान की मौत ने इस मुद्दे को फिर से वैश्विक चर्चा में ला दिया है। इस गोलीबारी में हमलावर ने अंधाधुंध फायरिंग की।
इस तरह की यह घटना अकेली नहीं है, न ही ये एक अलग प्रकार का कोई प्रकरण है, बल्कि यह पिछले कई वर्षों से सामने आ रही घटनाओं की एक चिंताजनक श्रृंखला का हिस्सा है। सवाल यह है कि क्या यह केवल अपराध की घटनाएँ हैं या इसके पीछे समाज में पनप रही कोई गहरी मानसिकता भी काम कर रही है?
अमेरिकी में रहने का भारतीयों का सपना और बढ़ती मौतें
अमेरिका लंबे समय से भारतीय छात्रों के लिए शिक्षा और करियर का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। हर वर्ष हजारों भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए वहाँ जाते हैं, किंतु पिछले कुछ वर्षों में सामने आई घटनाएँ इस “अमेरिकन ड्रीम” के पीछे छिपे खतरों को भी उजागर करती हैं। साल 2025 में टेक्सास में कार्तिक वेंकट साई बद्दिरेड्डी नामक छात्र की पेट्रोल पंप पर काम करते समय लूटपाट के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई। उसी वर्ष वॉशिंगटन डीसी में कोय्यादा रवि तेजा को खाना डिलीवरी करते समय लुटेरों ने गोली मार दी।
साल 2024 में जॉर्जिया में विवेक सैनी की निर्मम हत्या ने पूरे भारतीय समुदाय को झकझोर दिया। बताया गया कि वह एक बेघर व्यक्ति की मदद करता था लेकिन उसी व्यक्ति ने बाद में हथौड़े से हमला कर उसकी हत्या कर दी। इसी वर्ष वरुण राज पुचा नामक छात्र को जिम में चाकू मारकर हत्या कर दी गई, जिसे पुलिस ने संभावित हेट क्राइम माना। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका में पढ़ने जाने वाले विदेशी छात्रों की सुरक्षा वास्तव में उतनी मजबूत है जितनी बताई जाती है?
कामकाजी भारतीयों पर अपराधियों की नजर
अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र पढ़ाई के साथ-साथ छोटे-मोटे काम भी करते हैं। गैस स्टेशन, सुविधा स्टोर, डिलीवरी सेवाएँ और रेस्टोरेंट जैसे क्षेत्रों में भारतीय युवाओं की मौजूदगी काफी अधिक है और यही कार्यस्थल कई बार अपराधियों के लिए आसान निशाना बन जाते हैं।
साल 2018 में शरथ कोप्पू नामक भारतीय छात्र की रेस्टोरेंट में लूटपाट के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई। साल 2017 में विक्रम जरयाल को वॉशिंगटन में गैस स्टेशन पर काम करते समय गोली मार दी गई। साल 2023 में ओहायो में सैइश वीरा नामक युवक की गैस स्टेशन पर लूट के दौरान हत्या कर दी गई। वस्तुत: इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि सेवा क्षेत्र में काम करने वाले प्रवासी युवाओं को अक्सर असुरक्षित परिस्थितियों में काम करना पड़ता है, जहाँ अपराध की आशंका अधिक होती है।
नस्लीय घृणा का कड़वा सच
हालाँकि सभी घटनाओं को सीधे नस्लीय घृणा से नहीं जोड़ा जा सकता पर कुछ मामलों में ऐसी मानसिकता साफ दिखाई देती है। साल 2017 में कंसास में इंजीनियर श्रीनिवास कुचिभोटला की हत्या ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आक्रोश पैदा किया था। हमलावर ने गोली चलाने से पहले कथित रूप से कहा था, “अपने देश वापस जाओ।” इसी तरह वॉशिंगटन में दीप राय नामक सिख व्यक्ति पर गोली चलाने वाले हमलावर ने भी विदेशी विरोधी टिप्पणी की थी। इन घटनाओं ने यह सवाल उठाया कि क्या अमेरिका के समाज में विदेशी मूल के लोगों के प्रति असहिष्णुता बढ़ रही है।
कुछ घटनाएँ इतनी भयावह थीं कि उन्होंने पूरे भारतीय समुदाय को हिला दिया। साल 2022 में कैलिफोर्निया में भारतीय मूल के एक सिख परिवार-जसदीप सिंह, उनकी पत्नी जसलीन कौर, आठ महीने की बच्ची और भाई अमनदीप सिंह का अपहरण कर हत्या कर दी गई। साल 2026 में पंजाब के अवतार सिंह का कैलिफोर्निया में अपहरण कर हत्या कर दी गई। पुलिस के अनुसार यह संभवतः पहचान की गलती का मामला था।
रहस्यमयी मौतें और लंबी जांच
कुछ घटनाएँ ऐसी भी हैं जिनमें मौत के कारण स्पष्ट नहीं हो पाए। 2024 में परुचुरी अभिजीत का शव जंगल में एक कार के अंदर मिला। इसी वर्ष समीर कामथ और नील आचार्य जैसे छात्रों की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई। इन घटनाओं में कुछ सड़क दुर्घटनाएँ भी शामिल हैं, लेकिन उनमें भी विवाद सामने आए।
2023 में सिएटल में भारतीय छात्रा जाह्नवी कंदुला की मौत एक पुलिस वाहन की टक्कर से हो गई। बाद में एक पुलिस अधिकारी की कथित हंसी से जुड़ा ऑडियो सामने आया, जिसने इस मामले को और विवादित बना दिया। 2019 में टेक्सास में दो भारतीय छात्राओं की हिट-एंड-रन दुर्घटना में मौत हो गई थी। रिपोर्ट में तीन ऐसे मामले भी दर्ज हैं जिनमें भारतीयों पर हमला हुआ लेकिन वे बच गए। 2025 में शिकागो में एक भारतीय छात्र को कार में बैठे-बैठे गोली मार दी गई। 2024 में एक अन्य छात्र पर चार हथियारबंद लुटेरों ने हमला किया। ये घटनाएँ दिखाती हैं कि खतरा केवल जान जाने तक सीमित नहीं है।
भारतीय समुदाय की बढ़ती चिंता
अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की संख्या लगभग 50 लाख से अधिक है। यह समुदाय तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन लगातार सामने आ रही घटनाओं ने इस समुदाय के बीच असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है। भारत में भी उन परिवारों के बीच चिंता बढ़ रही है जिनके बच्चे पढ़ाई के लिए अमेरिका जाते हैं।
इन घटनाओं के बाद कई मामलों में अमेरिकी पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया और जांच भी की। भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास भी कई मामलों में पीड़ित परिवारों की मदद के लिए आगे आए। पर इसके बाद भी सवाल सिर्फ जांच या गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या प्रवासी समुदायों की सुरक्षा को पर्याप्त प्राथमिकता दी जा रही है?
इस तरह से देखें तो अमेरिका में पिछले दस वर्षों में हुई इन 41 घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि प्रवासी समुदायों की सुरक्षा को लेकर अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। भारतीय समुदाय ने हमेशा अपनी मेहनत, ज्ञान और प्रतिभा से दुनिया में पहचान बनाई है। ऐसे में यह उम्मीद की जाती है कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली लोकतंत्र में उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण मिलेगा। यदि ऐसा नहीं होगा तो यही समझा जाएगा कि अमेरिका की लोकतांत्रिक छवि में सत्यता नहीं है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
