मुंबई, 25 जनवरी (हि.स.)। परेल के प्रशिद्ध केईएम अस्पताल के नाम बदलने की मांग पर राजनीतिक जंग छिड़ गई है। कौशल विकास व मुंबई उपनगर के सहपालक मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा के अस्पताल के नाम बदलने की मांग पर एनसीपी (शरद पवार) के सांसद अमोल कोल्हे ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने लोढ़ा को अपने कंट्रक्शन प्रोजेक्टों के नाम अंग्रेजी के बजाए देश की मिट्टी से जुड़े नाम देने की सलाह दी है.

सांसद कोल्हे के अनुसार लोढ़ा को केईएम के इतिहास के बारे में शायद ठीक से पता नहीं होगा। आजादी के समय में भी केईएम अस्पताल ने नियम लागू किया था कि यहां सिर्फ़ भारतीय डॉक्टर ही होने चाहिए। मुंबई मनपा के कवल पांच मेडिकल कॉलेज हैं। उनमें से चार 1950 से पहले बने थे। इसका अर्थ है कि आजादी के 75 वर्ष में हम सिर्फ़ एक मेडिकल कॉलेज जोड़ पाए हैं। लोढ़ा को इस बारे में सोचना चाहिए. नाम बदलना भावनीक मुद्दा हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य की असल हालत पर भी ध्यान देना ज़रूरी है। मुंबई की आबादी 2 करोड़ है और उपलब्ध बेड की संख्या 50 हज़ार है। इनमें से सिर्फ़ 15 हज़ार बेड मनपा अस्पतालों में हैं। लोढ़ा ने रेजिडेंट डॉक्टरों से थोड़ी बातचीत की होती, तो उन्हें उनकी समस्याओं और काम के दबाव के बारे में पता चल जाता। लोढ़ा के प्रोजेक्ट्स के नाम लोढ़ा बेलमोंडो, लोढ़ा बेलाजियो, अल्टामाउंट, कासा बेला, ट्रंप टावर हैं। इसके बजाय आप अपनी मिट्टी से जुड़े नाम क्यों नहीं रखते। राम कुटीर, सीता सदन, लक्ष्मी निवास जैसे नाम ऱखने चाहिए।
इससे पहले मंत्री लोढ़ा ने केईएम अस्पताल के नाम का मुद्दा उठाते हुए कहा था कि किंग एडवर्ड नाम गुलामी की निशानी है. इसलिए यह नाम बदल देना चाहिए। एडवर्ड नाम रखने की क्या ज़रूरत है? भारत को आज़ाद हुए 75 साल हो गए हैं। देश 100 साल से ज़्यादा गुलाम रहा, उन्हें पूजने की कोई आवश्यकता नहीं है।
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हिन्दुस्थान समाचार / वी कुमार
