कोलकाता, 29 जनवरी (हि.स.)। काम के सिलसिले में कोलकाता जाना—इतना तो दस वर्षीय सुश्मिता सिंह कब का समझ चुकी थी। मेदिनीपुर स्थित घर में पढ़ाई के बीच उसके मन में बस एक ही सवाल रहता था—बाबा कब लौटेंगे? लेकिन जिस दिन पिता के घर लौटने की बात थी, उसी दिन उसकी पूरी दुनिया बदल जाएगी, यह चौथी कक्षा की छात्रा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

आनंदपुर की भीषण अग्निकांड ने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं। आग में झुलसे शवों के साथ-साथ न जाने कितने सपने भी राख हो गए—ठीक वैसे ही जैसे सुश्मिता के। दस साल की बच्ची यह नहीं जानती कि डीएनए टेस्ट क्या होता है और क्यों किया जाता है। शायद जिंदगी में पहली बार उसने यह शब्द सुना। लेकिन उसी डीएनए जांच की खातिर वह तमलुक से बारुईपुर पहुंची—एक ही उद्देश्य के साथ, अपने पिता का पता लगाना या उनके पार्थिव अवशेष की पहचान कर पाना।

जली हुई फैक्ट्री की राख से मिले हड्डियों के अवशेषों के जरिए अगर किसी तरह पिता की पहचान हो सके, इसी उम्मीद में सुश्मिता को घंटों इंतजार करना पड़ा। बुधवार रात बारुईपुर के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में लंबी प्रतीक्षा के बाद आखिरकार उसका डीएनए सैंपल लिया गया।
इससे पहले कोर्ट के आदेश के तहत सुदीप सिंह की मां नमिता सिंह के नाम पर डीएनए जांच की अनुमति दी गई थी। बाद में बारुईपुर जिला पुलिस अधीक्षक शुभेंद्र कुमार के प्रयास से नया कोर्ट ऑर्डर प्राप्त किया गया, जिसके तहत मां के स्थान पर बेटी सुश्मिता सिंह का डीएनए सैंपल लेने की अनुमति मिली। इस कानूनी प्रक्रिया में काफी समय लग गया।
अब सुश्मिता और उसका परिवार केवल समय के जवाब का इंतजार कर रहा है—कितने दिनों बाद आग की राख से उसके पिता की पहचान सामने आएगी। इंतजार में डूबी उस बच्ची की आंखों में अब भी वही सवाल तैर रहा है—“बाबा कब मिलेंगे?”—————
हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता
