डॉ. मयंक चतुर्वेदी

वर्तमान बजट सत्र के दौरान लोकसभा की सीटों में पचास प्रतिशत वृद्धि के संभावित प्रस्ताव को लेकर देश की राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा किया जा रहा है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे दक्षिण और छोटे राज्यों के खिलाफ एक “साजिश” के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है, परंतु इस पूरे मुद्दे का विश्लेषण यह संकेत देता है कि यह विमर्श तथ्यों से अधिक आशंकाओं और राजनीतिक पूर्वाग्रहों पर आधारित है। इसे कांग्रेस की “नासमझी की पराकाष्ठा” कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा!
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारत की संसद और विशेष रूप से लोकसभा की संरचना समय के साथ स्थिर नहीं रही है, इसमें कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। 1952 में पहली लोकसभा के गठन के समय कुल सीटों की संख्या 489 थीं, 1957 में सीटों की संख्या बढ़कर 494 हो गई। 1967 के परिसीमन के बाद सीटों की संख्या बढ़कर 520 कर दी गई जोकि 1973 (31वां संविधान संशोधन) जब सीटों की संख्या में बड़ी वृद्धि की गई। 1971 की जनगणना के आधार पर 1977 तक सीटों को 525 से बढ़ाकर 545 (543 निर्वाचित + 2 मनोनीत) कर दिया गया। वस्तुत: कांग्रेस को यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि यह वृद्धि देश की बढ़ती जनसंख्या और प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को ध्यान में रखकर की गई थी।
इसके बाद 42वां संविधान संशोधन (1976) के तहत परिसीमन की प्रक्रिया को वर्ष 2001 तक स्थगित कर दिया गया। बाद में 84वां संविधान संशोधन के माध्यम से इस स्थगन को 2026 तक बढ़ा दिया गया। इसका उद्देश्य था कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास किए हैं, उन्हें प्रतिनिधित्व में नुकसान न हो। यही संदर्भ बताता है कि संसद की सीटों का निर्धारण एक जटिल और संतुलित प्रक्रिया है, न कि किसी एक सरकार की मनमानी का परिणाम। ऐसे में कांग्रेस द्वारा यह आरोप लगाना कि नरेंद्र मोदी सरकार जबरन पचास फीसद सीट वृद्धि का बिल ला रही है, तथ्यों से परे प्रतीत होता है।
नए संसद भवन में लोकसभा के लिए 888 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था की गई है, जो भविष्य में होने वाली संभावित वृद्धि की ओर संकेत करती है। अब वर्तमान में 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 800+ करने के प्रस्तावों पर चर्चा चल रही है। जिसमें कि कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अपने बयान में दक्षिणी राज्यों को संभावित नुकसान की बात कही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु की सीटों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया, परंतु उनका यह तर्क अधूरा है क्योंकि यह केवल संख्यात्मक वृद्धि को देखता है, प्रतिनिधित्व के व्यापक सिद्धांत को नहीं।
वस्तुत: वे कैसे भूल सकते हैं कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का मूल आधार जनसंख्या होती है। यदि किसी राज्य की जनसंख्या अधिक है तब स्वाभाविक रूप से उसके प्रतिनिधियों की संख्या भी अधिक होगी। यह सिद्धांत न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व के अधिकांश लोकतंत्रों में लागू होता है। ऐसे में यदि उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 होती हैं और तमिलनाडु की 39 से 59 तो यह वृद्धि अनुपातिक ही मानी जाएगी।
इसके अलावा, यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्रस्तावित वृद्धि सभी राज्यों में समान प्रतिशत (50फीसद) के आधार पर की जा रही है। इससे किसी भी राज्य के वर्तमान अनुपात में तत्काल कोई बदलाव नहीं होगा। कांग्रेस का यह दावा कि इससे “गहरे प्रभाव” होंगे, अधिकतर काल्पनिक आशंकाओं पर आधारित है। मनीष तिवारी ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए परिसीमन को फ्रीज करने या नया फार्मूला खोजने की बात कही है, किंतु यह दृष्टिकोण भी व्यवहारिक नहीं लगता। यदि जनसंख्या बढ़ रही है और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को प्रभावी बनाना है, तब सीटों की संख्या बढ़ाना एक स्वाभाविक और आवश्यक कदम है।
महिला आरक्षण के संदर्भ में भी इस प्रस्ताव को देखा जाना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाना एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है। इससे वर्तमान प्रतिनिधियों की सीटें सुरक्षित रहने के साथ ही नए अवसर भी पैदा होंगे। वहीं कांग्रेस का यह तर्क देना कि इससे दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों को नुकसान होगा, एक प्रकार से क्षेत्रीय असंतोष को बढ़ावा देने का प्रयास प्रतीत होता है। जबकि वास्तविकता यह है कि परिसीमन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, जोकि सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है। अरे, इसका तो गठन ही जनगणना के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करने के लिए होता है। जिसे स्वयं राष्ट्रपति अनुच्छेद 82 के अंतर्गत करते हैं।
इस संबंध में अब तक एतिहासिक संदर्भ यही बताते हैं कि संसद में परिवर्तन हमेशा व्यापक सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत हुए हैं। चाहे वह 1976 का संशोधन हो या 2001 का, सभी निर्णयों का उद्देश्य देश की एकता और लोकतांत्रिक संतुलन को बनाए रखना रहा है। आज जब भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, तब संसद की संरचना को भी समय के अनुसार विकसित करना आवश्यक है। जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना वर्तमान भारतीय लोकतांत्रिक आवश्यकता है, निश्चित ही यह शासन की प्रभावशीलता को भी बढ़ाएगा।
कुल सार रूप में यहां कहना यही है कि आज कांग्रेस का इस मुद्दे पर खड़ा किया गया विमर्श तथ्यों की बजाय राजनीतिक आशंकाओं पर आधारित है। संसद की सीटों में वृद्धि एक दीर्घकालिक और आवश्यक सुधार है, जिसे क्षेत्रीय दृष्टिकोण से नहीं बल्कि राष्ट्रीय हित के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए, इसलिए जरूरी यह है कि इस विषय पर गंभीर और तथ्यात्मक चर्चा हो, न कि भ्रम और भय फैलाने वाली राजनीति। हम सतत एक मजबूत, संतुलित और समावेशी लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ते रहें, इसके लिए यही आवश्यक है कि देश में राजनीतिक या सामाजिक स्तर पर कोई झूठा नैरेटिव न गढ़े, जोकि इस वक्त कांग्रेस गढ़ती हुई दिखाई दे रही है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
