



बांकुड़ा, 15 मार्च (हि. स.)। लाल माटी के लिए प्रसिद्ध पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले में फाल्गुन संक्रांति के अवसर पर पारंपरिक घेंटू पूजा श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुई। आधुनिकता के दौर में भी जिले के ग्रामीण इलाकों में सदियों पुरानी यह लोक परंपरा आज भी जीवंत रूप में निभाई जा रही है।

घेंटू देवता, जिन्हें लोक परंपरा में घंटाकर्ण के नाम से भी जाना जाता है, देवता को चर्म रोगों से रक्षा करने वाला देवता माना जाता है। मान्यता है कि बसंत ऋतु में फैलने वाले विभिन्न रोगों से बचाव की कामना के साथ ग्रामीण इस पूजा का आयोजन करते हैं।
फाल्गुन संक्रांति की सुबह गांव की महिलाएं पारंपरिक विधि से खुले स्थान पर प्रतीकात्मक रूप में घेंटू देवता की पूजा करती हैं। मिट्टी की हांड़ी, गोबर, कौड़ी, सिंदूर और हल्दी लगे कपड़े से देवता का प्रतीक बनाया जाता है। पूजा के लिए गुड़, कलाइ (दाल) और अन्य सामान्य सामग्री अर्पित की जाती है।
पूजा के बाद बच्चे बांस से उस मिट्टी की हांड़ी को तोड़ते हैं और शाम होते ही गांव के बच्चे व ग्रामीण टोलियों में निकलकर घर-घर जाते हैं। वे पारंपरिक लोकगीत गाते हुए चावल, दाल और अन्य खाद्य सामग्री एकत्र करते हैं। इस दौरान “आलुर-मालुर चाल दाओ गो…” जैसे लोकगीतों की धुन से पूरा इलाका गूंज उठता है।
ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सामुदायिक मेलजोल का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। संग्रहित सामग्री से बाद में सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है। इस दिन विशेष रूप से फुट कलाई (भुने हुए दाने) और कान-जिलेपी (विशेष आकार की जलेबी) खाने की भी परंपरा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि घेंटू पूजा के माध्यम से नई पीढ़ी को भी अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है। हालांकि शहरी क्षेत्रों में यह परंपरा अब काफी कम दिखाई देती है, लेकिन ग्रामीण बंगाल में आज भी इसकी झलक देखने को मिल जाती है।
एक स्थानीय ग्रामीण शिक्षिका सबिता बाउरी ने कहा कि पहले इस पूजा में गांव के लगभग सभी लोग शामिल होते थे। अब समय बदल रहा है, लेकिन हम चाहते हैं कि नई पीढ़ी भी हमारी लोक संस्कृति और परंपराओं को बनाए रखे।
वहीं मेवरी गांव की अनीता पात्र ने कहा कि शाम को बच्चे जब घर-घर जाकर घेंटू के गीत गाते हैं तो पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि गांव के लोगों को एक साथ जोड़ने की परंपरा है।————–
हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता
