बाबू जगजीवन राम की जयंती (5 अप्रैल) पर विशेष

के पी तन्नेटी
आज 5 अप्रैल को पूरा देश बाबू जगजीवन राम की जयंती मनाता है। ये जयंती हमें भारतीय लोकतंत्र के संघर्ष, संकल्प और सामाजिक न्याय की अनवरत साधना के अध्याय की याद दिलाती है। बिहार के एक साधारण परिवार में जन्में जगजीवन बाबू ने अपने जीवनकाल में बड़े ही कठिन समय को देखा। उन्हें न केवल आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा, बल्कि जातिगत भेदभाव जैसी गहरी सामाजिक व्यवस्थागत बाधाओं से भी जूझे। इन विपत्तियों के बावजूद वे भारत के इतिहास के सर्वाधिक प्रभावशाली नेताओं में से एक बन खड़े हुए।
उनका सार्वजनिक जीवन उपलब्धियों का पर्याय रहा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेता के रूप में उन्होंने रक्षा और कृषि जैसे महत्वपूर्ण पदों पर अपना दायित्व निभाया। विशेषकर हरित क्रांति के दौर में उनका दूरदर्शी नेतृत्व भारत को आत्मनिर्भर कृषि राष्ट्र बनाने में निर्णायक सिद्ध हुआ। उनके इस समावेशी विकास दृष्टिकोण का ही परिणाम था कि कृषि क्षेत्र में सुधारों ने करोड़ों किसानों के जीवन को बदल कर रख दिया।
उनका योगदान कृषि तक ही सीमित नहीं रहा, उन्होंने स्वतंत्र भारत के निर्णायक क्षणों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। खासकर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में, जिसके फलस्वरूप बांग्लादेश का उदय हुआ। उनकी रणनीतिक सूझबूझ एवं राष्ट्र-सुरक्षा के प्रति अटल निष्ठा ने भारत की संप्रभुता व कल्याण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को उजागर किया।
हालाँकि, उनके जीवन का एक पक्ष यह भी है कि अपार योग्यता और अनुभव के बावजूद वे प्रधानमंत्री पद तक नहीं पहुंच सके। फिर भी उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वे कभी विचलित न हुए, अपितु अपने मंच से हाशिए के लोगों के अधिकारों की पैरवी की तथा उत्पीड़ितों की पुकार को मुखर किया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची पहचान अपने कर्म और मूल्यों से बनती है।
बाबू जगजीवन राम की तरह मैं भी उसी सामाजिक पृष्ठभूमि से आता हूँ। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी के रूप में, मैं बाबू जगजीवन राम की विरासत से गहरी प्रेरणा ग्रहण करता हूँ। उनका जीवन हम सभी के लिए एक स्पष्ट संदेश है- न्याय, समानता और अवसर केवल आदर्श नहीं, बल्कि सतत प्रयास से प्राप्त किए जाने वाले लक्ष्य हैं। उन्होंने सिखाया कि सच्चा नेतृत्व उपाधियों से नहीं, अपितु दूसरों के जीवन पर पड़े प्रभाव से मापा जाता है।
आज, उनकी जयंती के अवसर पर, हमें केवल उनके योगदानों का स्मरण ही नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारने का संकल्प भी लेना चाहिए। आइए, हम एक ऐसे महान नेता का सम्मान करें, जो केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि आशा, संघर्ष और परिवर्तन का प्रतीक हैं। आपकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेगी।
(लेखक, टीडीपी सांसद हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश
