– डॉ. रमेश ठाकुर

गाजियाबाद निवासी 32 वर्षीय हरीश राणा की इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ऐसा भावनात्मक फैसला है जो भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में पहली बार लिया गया। कोर्ट के आदेशानुसार इच्छा मृत्यु पर सभी प्रक्रियाएं बेशक मानवीय ढंग और चिकित्सीय निगरानी में होंगी लेकिन फैसला देने वाली पीठ के जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन खुद भी भावुक हो गए। उन्होंने स्वीकार किया कि ये निर्णय देना उनके लिए बहुत कठिन था लेकिन उन्हें अपने फैसले के जरिए एक व्यक्ति को उनके निष्क्रिय शरीर से होती अंतहीन पीड़ा से मुक्ति दिलवाना था जिसका उन्होंने कानूनी मर्यादयों में रहकर अपना फर्ज निभाया।
ये मामला अगस्त 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट से खारिज होकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था लेकिन यहां भी जजों की एकमत राय नहीं थी। काफी विमर्श के बाद शीर्ष कोर्ट ने ‘मेडिकल बोर्ड’ गठित करने का आदेश दिया। बोर्ड की जब रिपोर्ट पहुंची, जिसमें चिकित्सकों ने बताया कि हरीश का शरीर शत-प्रतिशत निष्क्रिय हो चुका है इसलिए वह इच्छा मृत्यु का हकदार है। फिलहाल, इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने जीवन के असमय अंत की चाहत पर समकालीन स्वास्थ्य देखभाल में ऐसी प्रथाओं की भूमिका पर अनोखी बहस को छेड़ा है। यह बहस सभ्य समाज के कानूनी, नैतिक, मानवाधिकार, स्वास्थ्य, धार्मिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जटिलताओं और गतिशील पहलुओं को भी सोचने पर विवश करेगी।
गौरतलब है कि इच्छा मृत्यु शब्द की उत्पत्ति ग्रीस में हुई थी, जिसका अर्थ होता है सुखद मृत्यु। कानून में जीवन का अधिकार’ अनुच्छेद 21 में निहित है जो एक प्राकृतिक अधिकार भी। लेकिन आत्महत्या जीवन का अप्राकृतिक अंत है और इसलिए ’जीवन के अधिकार’ की अवधारणा के साथ असंगत और विरोधाभासी है। भारत में आत्महत्या गैरकानूनी होने के बावजूद नहीं रूक रही। लेकिन इच्छा मृत्यु का नाम सुन कर न सिर्फ रोंगटे खड़े होते हैं बल्कि भावनाओं का समुद्र हिचकोले मारने लगता है। भारतीय सभ्यता सदैव से उदारवादी मानी गई है। इस लिहाज से कोई भी व्यक्ति किसी को मरने के लिए नहीं बोल सकता। लेकिन हरीश राणा का मामला इससे अलग है। बीते 13 वर्षों से उनके दर्द भरे जीवन को और लंबा नहीं खींचा जा रहा है। हरीश को दर्द भरे जीवन से मुक्ति दिलाने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं। शीर्ष अदालत ने हरीश के शरीर से जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दे दी है, जिसे चिकित्सकीय निगरानी में उनकी आखिरी सांसों को प्राकृतिक बनाया जाएगा।
बेशक ये निर्णय पहला है पर यह आखिरी हो। इसके दुरुपयोग के जोखिम कम नहीं हैं। भारत में ऐसे असंख्य मामले हैं जहां बीमार बुजुर्गों के परिजन उनकी धन-दौलत, संपत्तियों पर कब्ज़ा करने के लिए उनके मरने के इंतजार में हैं। ऐसे में वो भी उनकी इच्छा मृत्यु की चाह लेकर अदालतों तक पहुंचने लगेंगे। इस मसले में केंद्र सरकार को समग्र कानून या कोई व्यापक व्यवस्था बनानी होगा। हालांकि, ताजा फैसले को शीर्ष कोर्ट ने 2018 के कॉमन कॉज को कानूनी रूप से पैसिव यूथेनेशिया के तहत दिया है, जिसे बार-बार नहीं दोहराया जा सकता। हरीश का ये मामला दुर्लभ श्रेणी का है।
हरीश के साथ ये दुखद घटना अगस्त 2013 में रक्षाबंधन पर्व के दिन घटी थी। तब, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में वह सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष का छात्र था। अचानक हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर पड़ा। गिरने के बाद उसके ब्रेन में गहरी इंजरी हुई। तब से लेकर आज तक तमाम चिकित्सीय सुविधाएं दी गईं लेकिन सभी बेअसर साबित हुईं। पिछले साढ़े 13 सालों से वह अचैत अवस्था में बिस्तर पर है। सारे डॉक्टर हार गए, कोई दवा काम नहीं आई। हार कर माता-पिता घर उसे ले आए और लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे कर दिया।
इस दौरान माता-पिता की समूची जिंदगी आर्थिक और मानसिक रूप से बेटे के स्वस्थ होने की चाह में तबाह हो गई। झूठी आस में बेटे की सेवा करते रहे लेकिन उसकी भी सीमा होती है। आखिर कब तक वह बेटे को जिंदा रखते। माता-पिता शारीरिक रूप से भी जब कमजोर होने लगे तो उन्होंने हाईकोर्ट में इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई, जो अब कहीं जाकर मंजूर हुई है।
अदालत में लंबी जिरह हुई, कोर्ट द्वारा मंगाई गई ‘एम्स अस्पताल’ की रिपोर्ट जिससे साफ हुआ कि हरीश के ठीक किये जाने की कोई उम्मीद नहीं। तब, कोर्ट की पीठ ने भावुक होकर इच्छा मृत्यु पर कठोर निर्णय दिया।
दरअसल, ऐसा पड़ाव आ चुका था जिसे और लंबा नहीं खींचा जा सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने पूरे सम्मानपूर्वक हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजत देकर पूर्ण कार्य किया है। कोर्ट ने कहा है कि हरीश को अपार दुख में अब और नहीं रखा जा सकता। फिलहाल, एकाध दिनों में कोर्ट के आदेशानुसार हरीश के शरीर से जीवन रक्षक प्रणाली को हटाया जाएगा और पूरी मानवीय प्रक्रिया निभाकर उनके शरीर को मुक्ति दिलाई जाएगी।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
————————
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश
