-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

पश्चिम एशिया के खाड़ी क्षेत्र में बढ़ता सैन्य तनाव इस समय विश्व राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा विषय बन गया है। इजरायल, ईरान और अमेरिका से जुड़े सैन्य ठिकानों के इर्द-गिर्द बनती युद्ध जैसी स्थिति ने विश्व के वित्तीय बाजारों, ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक गतिविधियों को अस्थिर कर दिया है। हर बार देखने में यही आया है कि जब भी खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है, उसका सीधा प्रभाव वैश्विक तेल बाजार, महंगाई और आर्थिक विकास पर पड़ता है।
स्वाभाविक रूप से भारत जैसे बड़े आयातक देश को लेकर भी कई तरह की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं, किन्तु इन आशंकाओं के बीच एक सशक्त और आश्वस्त करने वाली सच्चाई भी सामने आ रही है कि भारत की अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत, संतुलित और तैयार स्थिति में है। यदि खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष लंबा भी चलता है तब भी भारत पर उसका प्रभाव सीमित रहेगा। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत की आर्थिक नीतियां, संस्थागत ढांचा और बाजार की मजबूती अब वैश्विक संकटों का सामना करने में सक्षम हो चुकी है।
सावधानी, तैयारी और नीति-निर्माताओं की सक्रियताखाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव को देखते हुए भारतीय नीति-निर्माता पहले ही सक्रिय हो चुके हैं। एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय बाजारों में स्थिरता बनाए रखने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं। आरबीआई ने सरकारी बॉन्ड यानी जी-सेक की यील्ड को संतुलित रखने के लिए बाजार में हस्तक्षेप किया है, जिससे वित्तीय प्रणाली में घबराहट पैदा न हो। इसके साथ ही विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करके रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित किया गया है और उसे 92 के स्तर से नीचे बनाए रखने में सफलता हासिल की गई है।
वस्तुत: यह कदम बता रहा है कि भारत की केंद्रीय बैंकिंग व्यवस्था वैश्विक संकटों को समझते हुए समय पर प्रतिक्रिया देने में सक्षम है। आज भारत के पास लगभग 600 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो किसी भी बाहरी आर्थिक झटके को सहने की क्षमता प्रदान करता है। इसके अलावा सोने का भंडार भी लगातार बढ़ाया जा रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार में इसका हिस्सा लगभग 17.6 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यह भी एक तरह की आर्थिक सुरक्षा ढाल है।
तेल संकट की चुनौती और भारत की रणनीतिखाड़ी क्षेत्र का सबसे बड़ा महत्व वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ा हुआ है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार होता है। यदि यहां कोई बाधा उत्पन्न होती है तो तेल की कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक है। वर्तमान स्थिति में ब्रेंट क्रूड लगभग 91 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई लगभग 89 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार यदि तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 डॉलर की वृद्धि होती है तब जरूर भारत के चालू खाते के घाटे पर कुछ दबाव पड़ सकता है, लेकिन यहां यह समझना भी जरूरी है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा रणनीति को काफी विविधतापूर्ण बना लिया है। रूस से कच्चे तेल की खरीद, दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंध और रणनीतिक तेल भंडार जैसी व्यवस्थाएं भारत को अचानक आने वाले संकटों से काफी हद तक बचाती हैं।
वैश्विक विकास का नया केंद्र बन रहा भारतअंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की हालिया रिपोर्ट इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का भविष्य एशिया, विशेष रूप से भारत और चीन के हाथों में है। आईएमएफ के अनुसार वर्ष 2026 में वैश्विक वास्तविक जीडीपी वृद्धि में भारत का योगदान लगभग 17 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। यह आंकड़ा उस आर्थिक परिवर्तन का संकेत है जो पिछले एक दशक में भारत में हुआ है।
आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। आईएमएफ ने 2025 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया है, जबकि अगले वित्त वर्ष के लिए भी 6.4 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर का अनुमान लगाया गया है। इसके मुकाबले अमेरिका का योगदान लगभग 9.9 प्रतिशत रहने की उम्मीद है, जबकि कई यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि से जूझ रही हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में भारत का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
जनसंख्या दबाव नहीं, विकास का अवसरभारत की अर्थव्यवस्था पर चर्चा करते समय अक्सर जनसंख्या को एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह सही है कि भारत की जनसंख्या बहुत बड़ी है, किंतु यह भी उतना ही सच है कि यही जनसंख्या भारत की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति भी है। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा युवा कार्यबल रखने वाला देश है। यह युवा आबादी उत्पादन, उपभोग और नवाचार तीनों क्षेत्रों में नई ऊर्जा प्रदान करती है।
भारत में हर वर्ष लाखों नए रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं। स्टार्ट-अप संस्कृति, डिजिटल अर्थव्यवस्था, विनिर्माण क्षेत्र में निवेश और सेवा क्षेत्र की तेजी से बढ़ती गतिविधियां रोजगार सृजन के नए रास्ते खोल रही हैं। वैश्विक कंपनियां भी चीन के बाद अब भारत को अपने नए उत्पादन केंद्र के रूप में देख रही हैं। “चीन प्लस वन” रणनीति के तहत कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा रही हैं।
वैश्विक बाजार में भारत की स्थिर छविवैश्विक संकट के दौर में निवेशक हमेशा ऐसे देशों की तलाश करते हैं जहां आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता हो। भारत इस समय उसी श्रेणी में खड़ा दिखाई देता है। विश्व की कई रेटिंग एजेंसियां और आर्थिक संस्थान लगातार इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि भारत की आर्थिक नींव मजबूत है। बुनियादी ढांचे में तेजी से निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, बैंकिंग क्षेत्र का सुधार और कर प्रणाली की पारदर्शिता ने भारत को एक भरोसेमंद निवेश गंतव्य बना दिया है।
यही कारण है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद विदेशी निवेश भारत की ओर आकर्षित हो रहा है। हालांकि यह कहना भी गलत होगा कि खाड़ी क्षेत्र का संघर्ष भारत को बिल्कुल प्रभावित नहीं करेगा। तेल की कीमतों में वृद्धि, महंगाई का दबाव और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं लेकिन भारत की आर्थिक संस्थाएं इन चुनौतियों को समझते हुए पहले से तैयारी कर रही हैं। आरबीआई की सतर्क नीति, सरकार की ऊर्जा रणनीति और मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार भारत को इन परिस्थितियों में संतुलित बनाए रखते हैं। यह वही परिपक्वता है जो किसी अर्थव्यवस्था को वैश्विक संकटों के बीच भी स्थिर बनाए रखती है।
आज भले खाड़ी क्षेत्र में चल रहा संघर्ष निश्चित रूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। तेल बाजार की अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव दुनिया के कई देशों के लिए आर्थिक संकट पैदा कर रहे हैं। पर भारत के संदर्भ में स्थिति अलग है। मजबूत नीतियां, सक्रिय केंद्रीय बैंक, विविध ऊर्जा स्रोत, विशाल घरेलू बाजार और युवा कार्यबल ये सभी कारक भारत को वैश्विक संकटों के बीच भी आगे बढ़ने की शक्ति देते हैं इसलिए यह समय घबराने का न होकर सावधानी और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते रहने का है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
