बरपेटा (असम), 03 मार्च (हि.स.)। दौल (होली) महोत्सव को लेकर सत्र नगरी (मठ) बरपेटा में भारी उत्साह देखा जा रहा है। इस बार बरपेटा सत्र में श्री कृष्ण के इस दौल यात्रा महोत्सव का पांच दिवसीय आयोजन किया गया है। 2 मार्च को गंध यात्रा से महोत्सव की शुरुआत हुई। गंध उत्सव के अवसर पर सोमवार को सत्र के मणिकूट गृह से दौल गोविंद महाप्रभु और कालीथ ठाकुर गोसाईं को कीर्तनघर के मणिकूट गृह से बाहर निकाला गया। दौल गोविंद महाप्रभु को पूर्व द्वार और काली ठाकुर गोसाई को उत्तर द्वार से सत्र के मठ की चौपाल में लाकर बड़े शराई में रखकर महास्नान पर्व संपन्न किया गया।

आरंभ के दिन सोमवार को बरपेटा राइजिंग क्लब के आयोजन में 26वें वर्ष के लिए बाटे-बाटे होली गीत प्रतियोगिता आयोजित की गयी। सत्र के करापाट के नीचे बाटे-बाटे होली आयोजन का उद्घाटन बरपेटा सत्र के बुज़ुर्ग सत्रीया डॉ. बाबुल चंद्र दास ने किया। 20 से अधिक टीमों ने इस कार्यक्रम में होली गीत प्रस्तुत किया। बरपेटा सत्र की दालान एवं करापाट के नीचे से शुरू हुए इस कार्यक्रम का समापन बरपेटा प्रेस क्लब के परिसर में हुआ। हर साल की तरह इस बार भी इस आयोजन को देखने के लिए हज़ारों लोग इकट्ठा होते हैं। इस बार के बाटे-बाटे होली गीत कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में प्रसिद्ध अभिनेता दीपज्योति केंटो (बेहरबारी आउट पोस्ट के मोहन) और गायिका स्वीटी दास उपस्थित रहीं। दोनों कलाकार पहली बार ऐसे एक कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर प्राप्त कर अत्यंत प्रभावित हुए और अपने अनुभव को व्यक्त किया।

इस दौरान दौल यात्रा महोत्सव के साथ लोग आनंद-उत्साह में बरपेटावासी सराबोर हैं। बरपेटा सत्र अब होली के गीतों में मस्त होता नजर आ रहा है। इसी के साथ होली गीत प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया है। महापुरुष माधवदेव द्वारा स्थापित ऐतिहासिक बरपेटा सत्र में यह उत्सव पांच दिनों तक आयोजित किया गया है। 2 मार्च (17 फागुन) से 6 मार्च (21 फागुन) तक बरपेटा सत्र में दौल महोत्सव का आयोजन किया गया है। 2 मार्च के दिन गंध यात्रा से महोत्सव की शुरुआत होगी। 3, 4 और 5 मार्च को भर्दौल मनाया जाएगा और 6 मार्च को रंगों का उत्सव होली या फाकुआ मनाया जाएगा। स्थानीय भाषा में इसे सुवेरी कहा जाता है। उस दिन विभिन्न रंगों की फागुड़ी छिटकाकर होली गीतों की ताल पर बरपेटा की वृद्ध महिलाएं आनंदित होंगी। पूरी सत्रीया परंपरा के अनुसार बरपेटा का दौल महोत्सव मनाया जाता है, जो असम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द राय
