रांची, 27 फ़रवरी (हि.स.)। झारखंड विधानसभा की कार्यवाही के दूसरी पाली में शुक्रवार को सदन में विधायक प्रदीप प्रसाद ने अधिकारियों की कार्यशैली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए।

प्रदीप ने ग्रामीण विकास विभाग की बजट पर चर्चा के दौरान कहा कि वर्तमान व्यवस्था में प्रखंड मुख्यालय बेलगाम हो गए हैं। किसी काम को कराने के दौरान कई अंचलाधिकारी खुलकर कहते हैं जिसको जहां कहना है कह दे। उनके द्वारा ली गई राशि ऊपर तक जाती है। ऐसे में समझ से परे है कि ऊपर में कौन है, किसके पास राशि जाती है।

प्रदीप प्रसाद ने मांग की कि प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही तय की जाए, जनप्रतिनिधियों की अनुशंसाओं पर समयबद्ध कार्रवाई हो। विकास योजनाओं के क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा सुनिश्चित की जाए,ताकि जनता को वास्तविक लाभ मिल सके।
उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर ग्रामीणों ने श्रमदान कर सड़क बनाई, फिर भी एक पुल या पुलिया तक स्वीकृत नहीं हो सका। कब निर्माण होगा,सदन में भी इसकी कोई स्पष्ट समय-सीमा या गारंटी नहीं दी जा रही है। ऐसे में क्षेत्र में जनता के बीच क्या मुंह दिखाएंगे, समझ में नहीं आता।
उन्होंने कहा कि इस सरकार में धरातल में कोई कार्य नहीं हो रहे। लेकिन सरकार का पक्ष रखने के लिए कई तेज-तर्रार अधिकारियों की तैनाती जवाब देने और व्यवस्था सुधारने के लिए की जाती है। जमीनी स्तर पर अपेक्षित काम नहीं हो रहा है।
उन्होंने पूर्ववर्ती रघुवर दास सरकार के कार्यों और उपलब्धियों को बेहतर बताते हुए कहा कि उस समय विकास कार्यों में गति थी। लेकिन पिछले एक वर्ष में उनके द्वारा की गई किसी भी अनुशंसा पर ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है। प्रदीप प्रसाद ने कहा कि जनप्रतिनिधि सदन में अपनी बातें रखते हैं,लेकिन यदि सुनवाई ही नहीं होती। ऐसे में जनता की समस्याओं का समाधान कैसे होगा।
विधायक ने कहा कि झारखंड की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अधिकारी न तो विधायकों और सांसदों की सुनते हैं और न ही सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों की। यदि जनहित के कार्य सफलतापूर्वक नहीं हो पा रहे हैं, तो जनप्रतिनिधियों को जनता के बीच दोबारा जाने का नैतिक अधिकार कैसे मिलेगा। उन्होंने कहा कि यदि व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो जनप्रतिनिधियों को सदन में आने का औचित्य भी नहीं रह जाएगा। उनके वक्तव्य के दौरान विधायक राजेश कच्छप ने हस्तक्षेप करते हुए चुटकी लेते हुए आपत्तियां दर्ज कराईं। उन्होंने आरोप लगाया कि अंचलाधिकारी (सीओ) और प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) की पोस्टिंग की प्रक्रिया जगजाहिर है। इसमें पारदर्शिता की कमी है।
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हिन्दुस्थान समाचार / Manoj Kumar
