-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय राजनीति में आरोपों की कमी कभी नहीं रहती। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु जब आरोप तथ्यों और वैश्विक वास्तविकताओं से कटकर राजनीतिक बयान बन जाते हैं तब वे स्वभाविक तौर पर अपनी गंभीरता खो देते हैं। हाल के दिनों में कांग्रेस की ओर से यह आरोप लगाया गया कि भारत की सरकार अमेरिका के सामने झुक गई है, ठीक वैसा ही है।
वस्तुत: यह आरोप सुनने में भले ही तेज और आक्रामक लगे, पर यदि इसे वैश्विक राजनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और दुनिया की वास्तविक परिस्थितियों की रोशनी में देखा जाए तो यह लगभग खोखला और निराधार प्रतीत होता है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि दुनिया की शक्ति संरचना कैसी है। आज भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कुछ ही देश ऐसे हैं जिनका प्रभाव राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक और सुरक्षा के क्षेत्र में व्यापक रूप से दिखाई देता है। अमेरिका उन देशों में सबसे प्रमुख है। उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, उसकी तकनीकी कंपनियां वैश्विक नवाचार की दिशा तय करती हैं और उसकी सैन्य शक्ति का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि दुनिया भर के देश उसके साथ सहयोग और साझेदारी की कोशिश करते हैं।
किसी देश की वास्तविक ताकत का सबसे बड़ा संकेत यह नहीं होता कि उसके बारे में राजनीतिक भाषणों में क्या कहा जा रहा है, वस्तुत: यह होता है कि दुनिया के लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं। यदि हम इस कसौटी पर अमेरिका को देखें तो एक सच्चाई साफ नजर आती है। दुनिया भर के करोड़ों लोग आज भी अमेरिका को अवसरों की भूमि मानते हैं। भारत, चीन, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के कई देशों से लाखों लोग हर साल अमेरिका में पढ़ने, काम करने और बसने का सपना देखते हैं।
यदि वैश्विक शक्ति के अन्य आयामों पर नजर डालें तो अमेरिका की बढ़त कई क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देती है। तकनीकी क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां वहीं से निकली हैं और सिलिकॉन वैली आज भी नवाचार का प्रमुख केंद्र मानी जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में भी कई शीर्ष विश्वविद्यालय अमेरिका में स्थित हैं और यही कारण है कि दुनिया भर के छात्र वहां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते हैं। अर्थव्यवस्था के स्तर पर अमेरिकी डॉलर अभी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में सबसे प्रभावशाली मुद्रा बना हुआ है।
इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी गंतव्य बना हुआ है और वहां प्रवासी मूल के लोगों की संख्या करोड़ों में है। यह केवल कानूनी रास्तों तक सीमित नहीं है। अमेरिका मेक्सिको सीमा पर हर साल हजारों लोग अवैध रूप से प्रवेश करने की कोशिश करते हैं। कठिन रेगिस्तानी रास्ते, नदियों का जोखिम और सख्त सीमा सुरक्षा के बावजूद लोग उस दिशा में बढ़ते रहते हैं। कई बार यह प्रयास दुखद घटनाओं में बदल जाता है और कुछ लोग अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। इसके बावजूद अमेरिका जाने का सपना खत्म नहीं होता। यह एक कठोर किंतु स्पष्ट सच्चाई है कि यदि कोई देश इतना महत्वहीन या कमजोर होता तब भला क्यों लोग अपनी जिंदगी को खतरे में डालकर वहां पहुंचने की कोशिश करते?
अमेरिका की ताकत उसकी सेना या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी संस्थाएं हैं। वहां का संविधान, न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों की व्यवस्था दुनिया में मजबूत लोकतांत्रिक ढांचे का उदाहरण मानी जाती है। इसी का एक ताजा उदाहरण जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को लेकर चल रही बहस है। अमेरिका में कई धार्मिक संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय से अपील की है कि जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रयास में “हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन” ने प्रमुख भूमिका निभाई है। इस संगठन ने सत्तावन धार्मिक संगठनों के साथ मिलकर संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में एक मित्र याचिका दायर की है। यह याचिका ट्रंप बनाम बारबरा नामक मामले में दी गई है जो इस समय न्यायालय में विचाराधीन है।
यह विवाद उस समय सामने आया जब दो हजार पच्चीस की शुरुआत में “डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन” ने एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से जन्मसिद्ध नागरिकता को सीमित करने का प्रयास किया। अमेरिका के संविधान के चौदहवें संशोधन में स्पष्ट रूप से लिखा है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति नागरिक माना जाएगा। यही प्रावधान अमेरिकी लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों में से एक है और इसी कारण इस विषय पर व्यापक बहस चल रही है।
इस बहस में एक दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया है कि हिन्दू समुदाय ने अपने तर्क यहां सिर्फ संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही सिद्ध करने के प्रयास नहीं किए हैं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर भी रखे हैं। “हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन” का कहना है कि हिंदू परंपरा पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की शिक्षा देती है। यह विचार महा उपनिषद में व्यक्त “वसुधैव कुटुंबकम” के सिद्धांत में मिलता है, जिसका अर्थ है कि उदार विचार वाले लोगों के लिए पूरी दुनिया एक परिवार होती है। संकीर्ण सोच वाले लोग किसी को अपना और किसी को पराया मानते हैं लेकिन उदार विचार वाले लोगों के लिए पूरी दुनिया एक परिवार होती है।
इसी प्रकार तैत्तिरीय उपनिषद में “अतिथि देवो भव” का संदेश दिया गया है, जिसमें अतिथि को देवता के समान सम्मान देने की बात कही गई है। कहा गया है कि अतिथि को देवता के समान मानकर उसका सम्मान करना चाहिए। यह उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता के विचार और मूल्य आज भी दुनिया के दूसरे हिस्सों में बसे भारतीय समुदाय के जीवन और सोच का हिस्सा हैं। फाउंडेशन ने यह भी कहा कि जन्मसिद्ध नागरिकता अमेरिका में धार्मिक विविधता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इन सभी तथ्यों के बीच भारत और अमेरिका के संबंधों को समझना भी जरूरी है। यह संबंध किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल की देन नहीं हैं। पिछले कई दशकों से भारत की विदेश नीति में अमेरिका के साथ सहयोग एक महत्वपूर्ण तत्व रहा है। दो हजार आठ का भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु समझौता इसका एक प्रमुख उदाहरण है। इसके बाद साल 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से लगातार रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ता गया है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार का स्तर भी तेजी से बढ़ा है और यह आंकड़ा सैकड़ों अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।
यहां भारतीयों के लिए समझने के लिए बहुत कुछ है, वस्तुत: कूटनीति का मूल सिद्धांत ही यही है कि कोई देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां बनाते हैं। इसमें भावनात्मक नारेबाजी का कोई औचित्य नहीं है बल्कि व्यावहारिक सोच की आवश्यकता होती है। इसी दृष्टि से देखें तो भारत का अमेरिका के साथ सहयोग वर्तमान की कोई कमजोरी नहीं है, यह तो एक सोचा-समझा निर्णय है। यही कारण है कि कांग्रेस का यह आरोप कि भारत-अमेरिका के सामने झुक गया है, वास्तविकता से बहुत दूर दिखाई देता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हर देश अपने हितों को ध्यान में रखकर फैसले करता है। अभी आपको जो दिख रहा है, इसे आप केंद्र सरकार की व्यावहारिक कूटनीति का हिस्सा कह सकते हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
