सहरसा, 21 फ़रवरी (हि.स.)।स्थानीय पोलटेक्निक निवासी मनीष झा द्वारा लिखित उपन्यास नदी और पर्वत : बेचैन जड़ों की यात्रा शीर्षक वाली यह पुस्तक एक साधारण व्यक्ति के वास्तविक जीवन के अनुभवों पर आधारित एक गहन व्यक्तिगत और चिंतनशील आत्मकथात्मक उपन्यास है,जिसने असाधारण चुनौतियों का सामना किया है।लेखक का जन्म कोसी नदी के बाढ़ग्रस्त मैदानों में हुआ है।जहां नदी की अनिश्चितता ने उन्हें कठिनाइयों और सहनशीलता दोनों का सामना करने की शक्ति दी। जर्जर स्कूलों, धूल भरे क्रिकेट मैदानों और बाढ़ से अक्सर प्रभावित होने वाली भूमि में बीते उनके बचपन ने उनमें शिक्षा की ललक और सहनशीलता की असीम शक्ति में विश्वास पैदा किया।दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क डीएसएसडब्ल्यू और फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज एफएमएस से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने अपना पूरा करियर शिक्षा, सशक्तिकरण और विकास के क्षेत्र में समर्पित कर दिया और हिमालय और पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानों में काम किया। दो दशकों से अधिक समय से उन्होंने भारती एयरटेल फाउंडेशन, टाटा ट्रस्ट्स और वुमन सर्व जैसी संस्थाओं के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,महिला सशक्तिकरण और खेल पर केंद्रित पहलों का नेतृत्व किया है।उनकी लेखन शैली, उनके जीवन की ही तरह, ग्रामीण और शहरी, व्यक्तिगत और राजनीतिक, स्मृति और आकांक्षाओं को जोड़ती है।यह कोसी नदी के बाढ़ के मैदानों में एक साधारण बचपन से लेकर उपेक्षित शिक्षा प्रणाली में संघर्ष, महत्वाकांक्षी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी, असफलताओं और अंत में एक सामाजिक कार्यकर्ता और व्यवस्थित शिक्षा नेता के रूप में उनके परिवर्तन तक की यात्रा का वर्णन करती है।यह पुस्तक विभिन्न चरणों के माध्यम से लचीलेपन, दृढ़ता और परिवर्तन के विषयों की पड़ताल करती है। नदी के बाढ़ के मैदान के किनारे कठिनाइयों के बीच बड़ा होना, दिल्ली के शहरी जीवन के साथ तालमेल बिठाना,आईएएस सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में बिताए लंबे वर्ष और बार-बार की असफलताओं से निपटना, सामाजिक कार्य शिक्षा और जमीनी स्तर पर सामुदायिक सशक्तिकरण को आगे बढ़ाना, आदिवासी और प्रवासी बच्चों सहित हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए शिक्षा तक पहुंच में सुधार के लिए विभिन्न राज्यों में काम करना और अंत में, हिमालय में अपने परिवार के साथ व्यक्तिगत शांति, अपनापन और जीवन का उद्देश्य पाना।यह कहानी यह बताती है कि कैसे संघर्ष और असफलताएं लचीलापन सिखा सकती हैं। कैसे व्यक्तिगत सपने व्यापक सामाजिक प्रभाव में बदल सकते हैं।कैसे सफलता अंततः पद या ओहदे से नहीं, बल्कि दृढ़ रहने के साहस, दूसरों को सशक्त बनाने की क्षमता और मानव जीवन में सार्थक बदलाव लाने की शांत विजय से मापी जाती है।

हिन्दुस्थान समाचार / अजय कुमार

