
गोरखपुर, 20 मार्च (हि.स.)। महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय गोरखपुर (एमजीयूजी) के स्वास्थ्य एवं जीवन विज्ञान संकाय की तरफ से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “एएमआर-शील्ड 2026” के दूसरे दिन शुक्रवार को तकनीकी सत्रों की श्रृंखला में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के आणविक, नैदानिक, पर्यावरणीय एवं पारंपरिक आयामों पर विशद विमर्श हुआ।

विश्वविद्यालय परिसर स्थित पंचकर्म सभागार में आयोजित तकनीकी सत्र में मुख्य वक्ता प्रोफेसर (डॉ.) प्रद्योत प्रकाश ने एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) को तेजी से उभरता वैश्विक स्वास्थ्य संकट करार दिया, जो प्रतिवर्ष लाखों मौतों के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि एंटीबाॅयोटिक दवाओं के अत्यधिक एवं अनुचित उपयोग के कारण यह स्थिति बनती दिख रही है। इससे जीवाणु अपने आनुवंशिक स्वरूप में परिवर्तन कर एंजाइम उत्पादन, लक्ष्य संशोधन, एफ्लक्स पंप तथा बाॅयोफिल्म निर्माण जैसे जटिल तंत्र विकसित कर लेते हैं। इससे संक्रमणों का उपचार अत्यंत जटिल हो जाता है। इस सत्र के दूसरे वक्ता डॉ. अमरेश कुमार सिंह ने एएमआर नियंत्रण के लिए सुदृढ़ एंटीबाॅयोटिक नीति की आवश्यकता पर बल देते हुए बिना परीक्षण दवा उपयोग पर चिंता जताई और ‘कल्चर एंड सेंसिटिविटी टेस्ट’ को अनिवार्य बताया। सत्र की अध्यक्षता डॉ. डीएस अजीथा तथा सह-अध्यक्षता डॉ. गौरव सिंह ने की।
दूसरे दिन के एक अन्य तकनीकी सत्र में डॉ. दीपा श्रीवास्तव ने “माइकोबाॅयोम-आधारित एंटीमाइक्रोबियल्स” विषय पर व्याख्यान देते हुए बताया कि स्थानीय सूक्ष्मजीव समुदायों से प्राप्त द्वितीयक मेटाबोलाइट्स एएमआर से निपटने के लिए प्रभावी विकल्प प्रस्तुत कर सकते हैं। इसी सत्र में प्रो. शरद कुमार मिश्रा ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में आर्सेनिक प्रदूषण एवं उससे संबंधित जैविक उपचार की संभावनाओं पर अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए और पर्यावरणीय कारकों के एएमआर पर प्रभाव को रेखांकित किया। दूसरे दिन के अंतिम सत्र में प्रो. (डॉ.) शैलेन्द्र कुमार ने “अस्पताल अपशिष्टों के माध्यम से एंटीबाॅयोटिक प्रतिरोध का पर्यावरणीय प्रसार” विषय पर व्याख्यान देते हुए अस्पतालों से निकलने वाले अपशिष्टों को एएमआर प्रसार का प्रमुख स्रोत बताया। इस सत्र के दूसरे वक्ता प्रो. (डॉ.) जीएस तोमर ने ऑनलाइन माध्यम से “एएमआर पर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण” प्रस्तुत करते हुए पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आयुर्वेदिक सिद्धांत रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ कर एएमआर नियंत्रण में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। सत्र की अध्यक्षता प्रो. (डॉ.) गिरधर वेदांतम एवं सह-अध्यक्षता डॉ. अतुल रुकड़ीकर ने की।
तकनीकी सत्रों के बाद ओरल प्रेजेंटेशन सत्र में प्रतिभागियों ने अपने शोध कार्य प्रस्तुत किए। प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान प्रतिभागियों ने बायोफिल्म, जीन ट्रांसफर, क्वोरम सेंसिंग तथा एएमआर के दीर्घकालिक समाधान जैसे विषयों पर गहन चर्चा की।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय
