-डा. अवधेश कुमार यादव

चण्डीगढ़ के गुप्ता जी रविवार के दिन मनोरंजन के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी वेब सीरीज देख रहे थे। उनका पांच साल का बेटा मोबाइल गेम में व्यस्त था। तभी टेलीविजन स्क्रीन पर पात्र अचानक से एक-दूसरे को जोर-जोर से गालियां देने लगे, जिसे देखकर उनका बेटा भी जोर-जोर से दोहराने लगा। गुप्ता जी रिमोट से सीरीज बंद कर देते हैं और मन ही मन सोचते हैं कि यह क्या हो रहा है? बचपन में तो हम अखबार पढ़कर भाषा सीखते थे। संपादकीय पन्नों से नए शब्द, मुहावरे और व्याकरण की बारीकियां आत्मसात करते थे। अब ये ओटीटी प्लेटफॉर्म्स बच्चों की जुबान गंदी कर रहे हैं। हिंदी न्यूज चैनल तो हिंग्लिश में ब्रेकिंग न्यूज चला रहे हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूलों से पढ़े पत्रकार ‘ग्राउंड जीरो’ और ‘एक्सक्लूसिव’ जैसे शब्द हिंदी में लिखकर प्रसारित कर देते हैं। ओटीटी ने ‘रियलिज्म’ के नाम पर अश्लीलता की सारी हदें पार कर दी हैं।

एक समय था जब हिंदी भाषा की शुद्धता, व्याकरण और वर्तनी का सबसे बड़ा शिक्षक अखबार हुआ करता था। 19वीं सदी के अंत से लेकर 20वीं सदी के अधिकांश भाग तक अखबार घर-घर में भाषा सिखाते थे। लोग संपादकीय, लेख और समाचार पढ़कर नए शब्द सीखते, मुहावरे समझते और व्याकरण की बारीकियां आत्मसात करते। हिंदी की लयबद्धता, संस्कृतनिष्ठ शब्दावली और उर्दू की मिठास का सुंदर संयोजन अखबारों की भाषा में झलकता था। वह दौर था जब भाषा को सम्मान दिया जाता था और उसे सँवारने का सतत प्रयास होता था।
फिर, टेलीविजन का दौर आया। 1980-90 के दशक में दूरदर्शन पर सरकारी नियंत्रण के कारण भाषा काफी हद तक शुद्ध बनी रही, लेकिन निजी न्यूज चैनलों के उदय के साथ सब कुछ बदल गया। अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा ने नई पीढ़ी को हिंदी से दूर कर दिया। स्कूलों में अंग्रेजी को प्रधानता मिली, हिंदी को माध्यमिक भाषा का दर्जा दिया जाने लगा। अंग्रेजी माध्यम से पढ़े-लिखे युवा जब हिंदी न्यूज चैनलों में पत्रकार बने, तो उन्होंने हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों को जबरदस्ती घुसेड़ना शुरू कर दिया। ब्रेकिंग न्यूज, ग्राउंड जीरो, एक्सक्लूसिव, स्पॉटलाइट, सोर्सेज के मुताबिक, डेवलपमेंट्स हो रही है जैसे वाक्य आम हो गए। ब्रेकिंग न्यूज की होड़ में अनुवाद की जल्दबाजी ने व्याकरण और शुद्धता को ताक पर रख दिया। चैनलों पर चीख-चीखकर खबरें पढ़ी जाने लगीं, जिससे भाषा की मर्यादा भी कमजोर पड़ गई।
लेकिन असली तबाही ओटीटी (ओवर-द-टॉप) प्लेटफॉर्म्स के साथ आयी। नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम वीडियो, डिज़्नी प्लस, हॉटस्टार, ज़ी फाइव आदि पर हिंदी वेब सीरीज ने भाषा की सारी पारंपरिक सीमाएं तोड़ दीं। संवाद अब शुद्ध हिंदी में नहीं, बल्कि हिंग्लिश, क्षेत्रीय बोलियों के मिश्रण और सबसे ज्यादा गालियों से भरे होते हैं। मिर्ज़ापुर, सेक्रेड गेम्स, पाताल लोक, कॉलेज रोमांस, हॉस्टल डेज़ जैसी वेब सीरीज में हर दूसरे वाक्य में अश्लील शब्द सुनाई देते हैं। ये शब्द अब सिर्फ पात्रों की भाषा नहीं रहे, बल्कि युवाओं की रोजमर्रा की जुबान बनते जा रहे हैं।
ओटीटी पर अश्लील कंटेंट की बाढ़ से न केवल संस्कृति का सत्यानाश हो रहा है, बल्कि समाज में भाषा की गंभीर समस्या भी उत्पन्न हो रही है। रियलिज्म और ऑथेंटिसिटी के नाम पर अश्लील सीन और संवाद आम हो गए हैं, लेकिन क्या वास्तविक जीवन में हर व्यक्ति हर वाक्य में गाली देता है? क्या कॉलेज के छात्रों की सामान्य भाषा इतनी गंदी होती है? यह सब युवा पीढ़ी पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाल रहा है। बच्चे और किशोर इन शब्दों को सुन-देखकर अपनी भाषा में शामिल कर लेते हैं, जिससे समाज में गाली-गलौज सामान्य लगने लगी है।
2025 में स्थिति और गंभीर हुई तो सरकार ने अश्लील और पोर्नाेग्राफिक कंटेंट के खिलाफ सख्त कदम उठाए। जुलाई 2025 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 25 ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (जिनमें उल्लू, एएलटीटी, बिग शॉट्स, डेसिफ्लिक्स, नियॉनएक्स वीआईपी इत्यादि) को ब्लॉक कर दिया, क्योंकि ये अश्लील, वल्गर और पोर्नाेग्राफिक सामग्री प्रसारित कर रहे थे। यह कार्रवाई आईटी एक्ट, 2000 और 2021 के इंटरमीडियरी गाइडलाइंस के तहत की गई। इससे पहले 2024 में भी 18 प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी ही कार्रवाई हुई थी। कुल मिलाकर, जुलाई 2025 तक 43 प्लेटफॉर्म्स ब्लॉक हो चुके हैं।
सरकार ने 2024 के अंत से ही ओटीटी कंटेंट के लिए नए दिशा-निर्देशों पर काम शुरू किया था, जिसमें प्रोफेनिटी (गाली-गलौज) को बीप करना, अश्लील सीन को ब्लर करना और इंटीमेट सीन के वैकल्पिक चित्रण को बढ़ावा देना शामिल है। हालांकि मुख्यधारा के प्लेटफॉर्म्स जैसे नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम आदि पर अभी भी सेंसरशिप नहीं है, बल्कि सेल्फ-रेगुलेशन और आईटी रूल्स 2021 के तहत तीन-स्तरीय तंत्र है। दिसंबर 2025 में सरकार ने लोकसभा में स्पष्ट किया कि ओटीटी कंटेंट सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) के दायरे में नहीं आता, बल्कि अलग से आईटी रूल्स के तहत नियंत्रित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में कहा है कि प्रोफेनिटी अपने आप में ओब्सेनिटी नहीं है (जैसे कॉलेज रोमांस मामले में 2024 का फैसला), लेकिन अश्लीलता और बच्चों की सुरक्षा पर चिंता जताई है। अप्रैल 2025 में कोर्ट ने एक याचिका पर केंद्र, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया को नोटिस जारी किया था।
यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है क्योंकि भाषा सिर्फ संवाद का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति और समाज का दर्पण है। जब भाषा में गंदगी आएगी, तो समाज में भी वह फैलेगी। युवा पीढ़ी की जुबान खराब हो रही है। अखबारों ने हिंदी को ऊंचा उठाया, टीवी ने गिराया और ओटीटी ने इसे गटर तक पहुंचा दिया। अब समय आ गया है कि सेन्सरशिप या सख्त रेगुलेशन को जरूरी माना जाए। सरकार को चाहिए कि मुख्यधारा ओटीटी पर भी प्रोफेनिटी फिल्टर, आयु-आधारित सख्त क्लासिफिकेशन और ब्लरिंग जैसे उपाय अनिवार्य करे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा, सांस्कृतिक गरिमा और भाषा की पवित्रता इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है। ओटीटी ने मनोरंजन के नाम पर भाषा और संस्कृति को भारी नुकसान पहुंचाया है। अब हमें तय करना है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां अखबारों की शुद्ध हिंदी सीखे या ओटीटी की गालियों से भरी जुबान अपनाए। सेन्सरशिप नहीं तो कम से कम सख्त रेगुलेशन जरूरी है, वरना हिंदी की दुर्गति रुकने का नाम नहीं लेगी।
(लेखक, राजकीय महाविद्यालय, कुल्लू में पत्रकारिता एवं जनसंचार विषय के सहायक प्रोफेसर हैं।)
—————
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश
