सुलतानपुर, 10 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर मे अयोध्या (तपस्वी छावनी) के जगतगुरु परमहंस आचार्य

ने कहा कि गाय हमारी माता है जन्म जन्म का नाता है। उसके लिए अविमुक्तेश्वरानंद कहे या एक्स वाई जेड कोई कहे गौरक्षा पूरे देश में होनी चाहिए। गोवंश राष्ट्रीय धरोहर घोषित होना चाहिए, ग्राम स्तर पर गौशाला बननी चाहिए और समुचित रूप से गाय की सेवा होना चाहिए। इस पर कोई मतभेद नहीं है हम सभी एक मत हैं। उन्होंने कहा अगर कांग्रेस आज उनका समर्थन करती है तो जहां-जहां उसकी सरकार है तो वहां-वहां राज्य माता घोषित कर दे।
शहर स्थित पयागीपुर में मंगलवार को एक निजी कार्यक्रम में स्वामी जी पहुंचे। जहां उन्होंने मीडिया से बात किया। अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर कहा मैं उनके गौरक्षा को लेकर चल रहे आंदोलन का समर्थन करता हूं। उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर कहा वो शंकराचार्य नहीं हैं, अभी उनका शंकराचार्य का पद विवादित चल रहा है। अविमुक्तेश्वरानंद मनु जी को अपशब्द कहने वाले अखिलेश यादव उनके संपर्क में हैं। जो कांग्रेस पार्टी ने 7 नवम्बर 1966 को देश के कोने-कोने से नवजवान किसान माताएं बहनें दिल्ली के संसद भवन पहुंचे थे। साधु संत मौजूद थे उस समय इंदिरा ने गोलियां चलवा दिया था। सब गाय को राष्ट्र माता घोषित कराने के लिए गए थे। लाखों लाशें बिछ गई थी आज कांग्रेस पार्टी अजय राय इनका समर्थन कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी इनका समर्थन कर रही है।
उन्होंने आगे कहा अविमुक्तेश्वरानंद योगी को औरंगजेब बोलेंगे, आप योगी को बोलोगे कि इस्तीफा दो तो यह साधु को शोभा थोड़ी देता है। हमने क्या कहा गाय को लेकर के पूरा देश एक मत है। बाकी राजनीति हो रही है।
श्री राम मंदिर बना सबने खुशी मनाई, इन्होंने कहा मुहर्त ठीक नहीं था। अरे भगवान का मंदिर बन गया खुशी मनाओ। काशी का कारिडोर बना पूरा देश खुशी मनाया, यह बोल रहें हैं वहां पूरा मंदिर तोड़ दिया गया। मतलब यह सिर्फ सपा, कांग्रेस और विपक्ष के इशारे पर भाजपा को नुकसान पहुंचाना, भाजपा का वोट कैसे कम हो, भाजपा कैसे हार जाए। यह प्रोपोगंडा इनका चल रहा है। बाकी इनको गाय से अगर लेना-देना होता तो, कितनी गौशाला इन्होने खोला है। आप अभियान चलाइये न जहां-जहां आप जाइये वह गौशाला खुलवाइये। किसी की गौशाला से कोई कसाई गाय थोड़े लेकर जाता है। जब किसान लाठी मारकर भगा देता है तब कोई ले जाता है क्योंकि वह अनाथ पड़ी है।
हिन्दुस्थान समाचार / दयाशंकर गुप्त
