बांदा, 15 मार्च (हि.स.)। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने बांदा जिले के ऐतिहासिक कालिंजर किले की पहाड़ी को राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल (नेशनल जियो-हेरिटेज साइट) के रूप में चिन्हित किया है। इस स्थल का औपचारिक उद्घाटन 16 मार्च 2026 को भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अपर महानिदेशक एवं विभागाध्यक्ष राजिंदर कुमार करेंगे। कार्यक्रम में जीएसआई और जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहेंगे।

कालिंजर किला अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है। अब यह एक दुर्लभ भूवैज्ञानिक घटना “एपार्कियन अनकॉन्फ़ॉर्मिटी” के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में आ गया है। नरैनी तहसील में स्थित कालिंजर की पहाड़ी पृथ्वी के करोड़ों वर्ष पुराने इतिहास की झलक दिखाती है।
कालिंजर की पहाड़ी दो अलग-अलग युगों की चट्टानों के मिलन स्थल के कारण विशेष मानी जाती है। किले की ओर जाने वाली सड़क के किनारे यह दृश्य साफ देखा जा सकता है। पहाड़ी का आधार प्राचीन आर्कियन-प्रोटेरोज़ोइक युग की गुलाबी-लाल बुंदेलखंड ग्रेनाइट चट्टानों से बना है। इसके ऊपर लगभग 1.2 अरब वर्ष पुरानी विंध्यन सुपरग्रुप की कैमूर बलुआ पत्थर की परत पाई जाती है। इन दोनों परतों के बीच का संपर्क ही एपार्कियन अनकॉन्फ़ॉर्मिटी कहलाता है, जो पृथ्वी के इतिहास के एक लंबे कालखंड को दर्शाता है।
कालिंजर किला भू-सांस्कृतिक परिदृश्य का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। मेज़नुमा सपाट शिखर वाली इस पहाड़ी ने प्राचीन काल में किले को प्राकृतिक और मजबूत सुरक्षा प्रदान की। किले की दीवारों और नक्काशी के निर्माण में स्थानीय कैमूर बलुआ पत्थर और बुंदेलखंड ग्रेनाइट का ही उपयोग किया गया है।
खजुराहो के यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल और चित्रकूट जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों के पास स्थित होने के कारण कालिंजर अब भू-पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र बनने की ओर बढ़ रहा है। यहां की अनोखी चट्टानी बनावट और घना वन क्षेत्र शोधकर्ताओं, छात्रों और पर्यटकों के लिए खास आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं।
यह जानकारी जिला प्रशासन की ओर से दी गई है।
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हिन्दुस्थान समाचार / अनिल सिंह
