पुरुलिया, 05 अप्रैल (हि.स.)। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस आंतरिक गुटबाज़ी और संगठनात्मक असंतोष से जूझती दिखाई दे रही है। चुनावी माहौल के बीच पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों ने राजनीतिक समीकरण को जटिल बना दिया है।

इस बार जिले के विभिन्न इलाकों में राम नवमी और हनुमान जयंती की शुभकामनाओं वाले पोस्टर और होर्डिंग चुनावी परिपेक्ष में बड़ी मात्रा में लगाए गए थे। इनमें विभिन्न दलों के प्रत्याशी मतदाताओं को आकर्षित करने वाले शब्दों का प्रयोग भी खूब हुआ। स्थानीय निवासी शैलेश बागची का कहना है कि पहले अपेक्षाकृत शांत माने जाने वाले इस क्षेत्र में अब धार्मिक भावनाओं का प्रभाव भी चुनावी माहौल में स्पष्ट दिखने लगा है।
वर्ष 2011 में पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद से पुरुलिया जिले में भाजपा की राजनीतिक पकड़ लगातार मजबूत हुई है। आंकड़ों के अनुसार, 2016 और 2021 के विधानसभा चुनाव तथा 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में ग्रामीण क्षेत्रों में तृणमूल ने कुछ हद तक स्थिति संभाली, लेकिन शहरी क्षेत्रों में पार्टी को लगातार नुकसान उठाना पड़ा है। वर्तमान में भी स्थिति में कोई खास सुधार नजर नहीं आ रहा है।
पार्टी के भीतर मतभेद भी खुलकर सामने आने लगे हैं। तृणमूल नेतृत्व द्वारा सुजय बंद्योपाध्याय को दोबारा उम्मीदवार बनाए जाने के बाद असंतोष बढ़ गया है। दिवंगत तृणमूल नेता केपी सिंहदेव के पुत्र दिव्यज्योतिप्रसाद सिंहदेव ने नाराज होकर कांग्रेस का दामन थाम लिया। वहीं, पार्टी के कुछ कार्यकर्ता भी इस फैसले से असंतुष्ट होकर निष्क्रिय हो गए हैं। उनका कहना है कि पिछले चुनाव में हार के बाद इस सीट पर उम्मीदवार बदलने की जरूरत थी, लेकिन उनकी राय को महत्व नहीं दिया गया।
हालांकि सुजय बंद्योपाध्याय के एक समर्थक ने नाम न बताए जाने के शर्त पर बताया कि अगर पिछले चुनाव में अंदरूनी साज़िश नहीं होती तो वे जीत हासिल कर सकते थे।
स्थिति को संभालने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में यहां प्रचार के दौरान पार्टी नेताओं को एकजुट होकर काम करने का निर्देश दिया। उन्होंने एक वरिष्ठ पार्षद को भी तलब किया था, लेकिन अब तक जमीनी स्तर पर एकजुटता के स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं।
दूसरी ओर भाजपा ने यहां दो बार के विधायक सुदीप मुखोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया है। हालांकि पार्टी के भीतर भी उनके नाम को लेकर कुछ असंतोष की चर्चा है, क्योंकि पहली सूची में उनका नाम शामिल नहीं था।
इन परिस्थितियों में तृणमूल कांग्रेस के सामने चुनौती दोहरी हो गई है, एक ओर विपक्ष का दबाव और दूसरी ओर आंतरिक गुटबाज़ी।
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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता
