सारण, 09 फ़रवरी (हि.स.)। छपरा व्यवहार न्यायालय में सुरक्षा नियमों को लेकर उपजा विवाद अब एक गंभीर संवैधानिक और प्रशासनिक गतिरोध में बदल चुका है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा लागू की गई नई सुरक्षा गाइडलाइन के विरोध में जिले के तमाम अधिवक्ताओं ने न्यायिक कार्यों का पूर्ण बहिष्कार कर दिया है। सोमवार को स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब कोर्ट परिसर में भारी संख्या में सशस्त्र जवानों और रैपिड एक्शन बलों की तैनाती कर दी गई।

अधिवक्ताओं ने इसे अपनी गरिमा पर सीधा प्रहार बताते हुए जोरदार नारेबाजी की और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। मामले की शुरुआत प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा जारी आदेश संख्या 385G/25 और संशोधित आदेश 16G/26 से हुई। इसके तहत कोर्ट के गेट नंबर 1 पर पुलिस बैरियर लगाए गए हैं और नियम बनाया गया है कि सुबह 11:00 बजे के बाद कोई भी वाहन दोपहिया या चार पहिया परिसर में प्रवेश नहीं करेगा। साथ ही, प्रवेश के लिए स्कैनर गेट से गुजरना अनिवार्य कर दिया गया है।

अधिवक्ताओं का आरोप है कि चेकिंग की आड़ में उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। सारण बार एसोसिएशन के महामंत्री अमरेंद्र कुमार सिंह ने दो टूक कहा, अधिवक्ता सुरक्षा के विरोधी नहीं हैं, लेकिन आत्मसम्मान की बलि देकर थोपी गई व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है।
अधिवक्ताओं का तर्क है कि वकालत के पेशे में आवाजाही का कोई निश्चित समय नहीं होता। छपरा के कई अधिवक्ता मढ़ौरा और सोनपुर न्यायालयों में भी प्रैक्टिस करते हैं, जिन्हें दिनभर में कई बार कोर्ट आना-जाना पड़ता है। इसके अलावा, परिसर में कई बुजुर्ग और वरिष्ठ अधिवक्ता हैं जो चलने-फिरने में असमर्थ हैं। बैरियर लगाकर उनके वाहनों को रोकना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि उनके विशेषाधिकारों का हनन भी है।
बीते शुक्रवार और शनिवार को हुई ‘कलमबंद हड़ताल’ के बाद रविवार को जिला जज पुनीत कुमार गर्ग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बीच का रास्ता निकालने की बात कही थी। हालांकि सोमवार सुबह जब अधिवक्ता कोर्ट पहुंचे, तो वहां संवाद के बजाय पुलिस और अर्धसैनिक बलों का कड़ा पहरा मिला।
अधिवक्ताओं का मानना है कि न्यायिक परिसर में इस तरह बलों की तैनाती उन्हें डराने और उनके लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचलने की कोशिश है। बार और बेंच के इस टकराव में बीच आम जनता पिस रही है, सैकड़ों जमानत अर्जियां लंबित हैं, जिससे लोग जेलों में बंद रहने को मजबूर हैं, दूर-दराज के गांवों से आए गवाह बिना सुनवाई के मायूस लौट रहे हैं और महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेजों का निष्पादन पूरी तरह ठप है। हालांकि सेकंड हाफ के बाद वार्ता का समय निर्धारित है, फिलहाल गतिरोध जस का तस बना हुआ है। अधिवक्ताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनके सम्मान को बहाल करते हुए ठोस समाधान नहीं निकलता तब तक हड़ताल जारी रहेगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय कुमार
