डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत का संविधान अपने मूल में एक ऐसे समाज की परिकल्पना करता है जहाँ प्रत्येक नागरिक को समान अवसर प्राप्त हों और वह अपने सामर्थ्य के अनुरूप विकास कर सके। यह विचार कहना होगा कि एक संवैधानिक संकल्प है जिसे अनुच्छेद 14, 21क और अन्य प्रावधानों के माध्यम से स्थापित किया गया है, किंतु जब हम शिक्षा के क्षेत्र में इस समानता की वास्तविक स्थिति का आकलन करते हैं तब एक जटिल और विरोधाभासी परिदृश्य सामने उभरकर आता है।
वस्तुत: राज्यसभा में दिनेश शर्मा द्वारा उठाया गया प्रश्न इस विरोधाभास को और अधिक स्पष्ट करता है जिसमें उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त संरचनात्मक असमानता की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उनका यह तर्क कि “संविधान की समानता की भावना के बावजूद शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव मौजूद है!” भले ही ये कहना किसी राजनेता का हो, किंतु यह वक्तव्य भारत की हकीकत है, जोकि आज एक गहन संवैधानिक विमर्श का विषय है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। इसके साथ ही अनुच्छेद 21क के अंतर्गत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित किया गया है जिसे 86वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 के माध्यम से जोड़ा गया। यह संशोधन इस बात का प्रतीक था कि शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 29 और 30 सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करते हैं, विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों को अपने शिक्षण संस्थान स्थापित करने और संचालित करने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ समानता और विशेषाधिकार के बीच संतुलन का प्रश्न उत्पन्न होता है।
राज्यसभा में प्रस्तुत विचारों के अनुसार अल्पसंख्यक संस्थानों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के कुछ प्रावधानों से छूट प्राप्त है जबकि अन्य संस्थानों को इन नियमों का पूर्णतः पालन करना होता है। दिनेश शर्मा ने इस स्थिति को अनुच्छेद 14 के साथ असंगत बताया और यह तर्क दिया कि इससे शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रकार की संरचनात्मक असमानता उत्पन्न होती है। यहां समझ लें कि यह प्रश्न प्रशासनिक अथवा कानूनी नहीं है, यह उस मूलभूत विचार से जुड़ा है कि क्या राज्य सभी बच्चों को समान दृष्टि से देखता है?
इस संदर्भ में अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट प्रदान कर एक तरह से देश में शिक्षा के व्यावहारिक स्तर पर एक असमान ढाँचे को भी वैधता प्रदान कर दी गई है। देखा जाए तो शिक्षा व्यवस्था में यह असमानता कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं है, यह संरचनात्मक और व्यावहारिक रूप में भी स्पष्ट दिखाई देती है। भारत में सरकारी विद्यालय, निजी विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और धार्मिक शिक्षण संस्थान इन सभी की गुणवत्ता संसाधन और अवसरों में भारी अंतर है। एक ओर महानगरों के निजी विद्यालय अत्याधुनिक सुविधाओं और वैश्विक स्तर की शिक्षा प्रदान करते हैं वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं का अभाव देखा जा सकता है। इस असमानता का परिणाम यह है कि विभिन्न पृष्ठभूमियों के छात्र एक ही प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेते हैं किंतु उनकी तैयारी और अवसर समान नहीं होते।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी अपने विभिन्न प्रतिवेदनों में इस बात पर बल दिया है कि शिक्षा की गुणवत्ता और पहुंच में समानता सुनिश्चित किए बिना बाल अधिकारों की वास्तविक रक्षा संभव नहीं है। आयोग की 2018 की एक रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “समान शिक्षा प्रणाली ही सामाजिक न्याय की आधारशिला बन सकती है।” वस्तुत: यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि शिक्षा में असमानता सिर्फ शैक्षणिक समस्या तक सीमित नहीं है, यह सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है।
भारतीय चिंतन परंपरा में भी शिक्षा को समानता का माध्यम माना गया है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक “एजुकेशन पॉलिटिक्स एंड वॉर” में लिखा है, “शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ ज्ञानार्जन नहीं है, इससे समाज में नैतिक और सामाजिक संतुलन स्थापित करना है।” इसी प्रकार महात्मा गांधी ने “हरिजन” में यह विचार व्यक्त किया कि “समान शिक्षा के बिना सच्चा लोकतंत्र संभव नहीं है।” इन विचारों से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा को व्यक्तिगत विकास का साधन होने के साथ ही सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी माना गया है।
समान शिक्षा की आवश्यकता को कई स्तरों पर समझा जा सकता है। सामाजिक दृष्टि से यह जाति वर्ग और धर्म आधारित विभाजनों को कम कर सकती है। आर्थिक दृष्टि से यह सभी को समान अवसर प्रदान कर प्रतिस्पर्धा को निष्पक्ष बना सकती है। राजनीतिक दृष्टि से यह लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है क्योंकि शिक्षित और जागरूक नागरिक ही लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ कर सकते हैं। वैचारिक दृष्टि से यह समाज में एकरूपता और समरसता को बढ़ावा दे सकती है। यह भी सच है कि समान शिक्षा लागू करने में अनेक चुनौतियाँ भी हैं। क्योंकि भारत की विशाल जनसंख्या भाषाई और सांस्कृतिक विविधता राज्यों के अधिकार और निजी क्षेत्र की भूमिका ये सभी कारक इस प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं। अतः समाधान का मार्ग संतुलन में निहित है जहाँ समानता और विविधता दोनों का सम्मान किया जाए।
वर्तमान समय में “राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020” ने इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल करने का प्रयास किया है। इस नीति में समानता, समावेशन और गुणवत्ता पर विशेष बल दिया गया है। नीति के अंतर्गत स्कूल कॉम्प्लेक्स की अवधारणा बहुभाषी शिक्षा और डिजिटल संसाधनों के माध्यम से शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की बात की गई है, किंतु इन नीतिगत प्रयासों के बावजूद जमीनी स्तर पर असमानता अभी भी बनी हुई है जिसका मुख्य कारण क्रियान्वयन की चुनौतियाँ और संस्थागत विविधता है।
इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। सबसे पहले सभी शिक्षण संस्थानों के लिए न्यूनतम गुणवत्ता मानक निर्धारित किए जाएँ जिनका पालन अनिवार्य हो। दूसरा शिक्षा का अधिकार अधिनियम में आवश्यक संशोधन कर सभी संस्थानों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। तीसरा शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाए ताकि संसाधनों का न्यायसंगत वितरण हो सके। चौथा संसद और नीति निर्माताओं को इस विषय पर सर्वसम्मति से निर्णय लेना चाहिए ताकि शिक्षा को राजनीतिक विवादों से ऊपर उठाया जा सके।
अत: यहां कहने का तात्पर्य यही है क हम सभी यह स्वीकारें कि समान शिक्षा एक नीतिगत लक्ष्य न होकर देश हित में एक नैतिक आवश्यकता है। जब तक भारत के प्रत्येक बच्चे को समान गुणवत्ता की शिक्षा नहीं मिलेगी तब तक संविधान में निहित समानता का स्वप्न अधूरा ही रहेगा। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी है कि “शिक्षा वह शस्त्र है जिससे हम समाज को बदल सकते हैं।” कहना होगा क यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता के समय था, इसलिए समय की मांग है कि शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त असमानताओं को दूर करने के लिए गंभीर और समन्वित प्रयास किए जाएँ। राज्यसभा में उठी यह बहस एक अवसर है, एक ऐसे भारत के निर्माण का जहाँ शिक्षा वास्तव में समान हो और हर नागरिक को अपने सपनों को साकार करने का समान अवसर प्राप्त हो सके। हम उम्मीद करें कि केंद्र एवं राज्य सरकारें इस विषय पर गंभीरता से विचार करेंगी।
————–
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
