-अतीत के रक्तरंजित इतिहास और बौद्धिक भ्रष्टाचार को पीछे छोड़कर एक नया, आत्मनिर्भर और गौरवशाली असम बनाने के लिए मुख्यमंत्री ने युवा समाज से किया आह्वान

गुवाहाटी, 08 फरवरी (हि.स.)। असम मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा ने आज सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘प्रज्ञा’ के आयोजन में गुवाहाटी के खानापारा स्थित ज्योति-विष्णु अंतरराष्ट्रीय कला मंदिर में आयोजित ‘युवा नेतृत्व समारोह 5127’ में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से आए हजारों युवक और युवतियों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने असम के इतिहास, वर्तमान की चुनौतियां और भविष्य के उज्जवल मार्ग की रूपरेखा का विस्तार से विवरण प्रस्तुत किया।
अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने कहा कि एक नया, आत्मनिर्भर और गर्वीला असम बनाने की जिम्मेदारी अब नई पीढ़ी पर सौंप दी गई है। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता-संस्कृति के साथ असम का संबंध महाभारत-रामायण के समय से अविच्छिन्न है। कुमार भास्कर बर्मा जैसे शक्तिशाली राजा के शासनकाल की याद दिलाते हुए डॉ. सरमा ने कहा कि हमारा इतिहास केवल यांडाबु सम्मेलन तक सीमित नहीं है; बल्कि नवम-दसवें शताब्दी में असम के राजा ने उत्तर प्रदेश के कन्नौज तक साम्राज्य का विस्तार किया। उन्होंने उल्लेख किया कि भगदत्त और बबाहन जैसे पात्रों ने हमारे देश की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अतीत के संघर्षों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि मुगलों ने पूरे भारत में तलवार और बंदूक के बल पर धर्म परिवर्तन का माहौल पैदा किया था, उस समय असम के वीरों ने 17 बार मुगल आक्रमणों को रोक दिया था। महाराजा पृथु ने शुरुआत की थी और लाचित बरफुकन ने इसे एक निर्णायक स्थान तक पहुंचाया।
उन्होंने दोहराया कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ चले पहले सिपाही विद्रोह से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के हर स्तर में असम ने भारत की मुख्य धारा के साथ एकजुट होकर हिस्सा लिया। असम के आर्थिक पतन के कारणों को मुख्यमंत्री ने बताते हुए कहा कि देश के विभाजन ने हमें एक बड़ी आर्थिक गति से वंचित कर दिया। चटगांव बंदरगाह से संबंध टूटने और 22 किलोमीटर की ‘चिकन नेक’ ने हमें दिल्ली से बहुत दूर धकेल दिया। 1950 के भयंकर भूकंप ने असम के लिए वरदान रूपी ब्रह्मपुत्र की गहराई को कम कर दिया और इसे बाढ़ की अभिशप्त स्थिति में बदल दिया, इसका उन्होंने खेद व्यक्त किया।
पिछले दशकों के अशांत माहौल को याद करते हुए उन्होंने कहा कि 1979 से शुरू हुआ असम आंदोलन और उसके बाद की उग्रवादी गतिविधियों ने राज्य के जनजीवन को ठप कर दिया। खून के आंदोलन, बम विस्फोट, सांध्य कानून और बंदूकें हमारे जीवन का हिस्सा बन गई थीं। डॉ. सरमा ने कहा कि जिस असम का जनसांख्यिकीय आय उस समय देश में शीर्ष पर था, उस असम को आंदोलन और उग्रवाद ने बहुत पीछे कर दिया। एशिया के सबसे पुराने तेल शोधनागार और लंबी रेल लाइन होने के बावजूद हमारे लिए विकास की दौड़ में पीछे रह जाना एक ऐतिहासिक दुर्भाग्य था। बौद्धिक भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर होकर मुख्यमंत्री ने कहा कि एक हिस्से के तथाकथित बुद्धिजीवियों ने हमारे दुर्भाग्य को अपनी रचनाओं का सामग्री बना कर राज्य को अस्थिर करने की कोशिश की।
उन्होंने बहुत कठोर भाषा में में कहा कि कुछ लोग हमें समझाने की कोशिश करते हैं कि असम नेपाल या बांग्लादेश की तरह होना चाहिए। बांग्लादेश में छात्र आंदोलन के नाम पर चल रही अराजकता और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार की बात याद कर उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसी स्थिति हमारे लिए आदर्श हो सकती है? उन्होंने कहा कि असम को बांग्लादेश बनाने की बात कहना एक बड़ा ‘बौद्धिक भ्रष्टाचार’ है। इसके बजाय हमारी युवा पीढ़ी को असम को कर्नाटक, महाराष्ट्र या अमेरिका-इंग्लैंड की तरह विकसित करने का सपना देखना चाहिए।
राज्य के हाल के विकास की कहानी उजागर करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि 2021 से 2025 तक भारत की आर्थिक वृद्धि 29 प्रतिशत होने के मुकाबले असम की विकास दर 45 प्रतिशत तक बढ़ गई है। आज असम आर्थिक क्षेत्र में पश्चिम बंगाल को पीछे छोड़ने की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि अब असम में कोई मध्यम वर्ग का स्थान नहीं है; 1 लाख 60 हजार युवा बिना किसी पैसे के, केवल योग्यता के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल कर चुके हैं।
भविष्य की योजनाओं का उल्लेख करते हुए डॉ. सरमा ने कहा कि टाटा का सेमिकंडक्टर उद्योग, नामरूप कारखाना, बांस से इथेनॉल उत्पादन उद्योग आदि असम को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करेंगे। हमारे अभियंता और चिकित्सक मिलकर स्वास्थ्य शोध के क्षेत्र में नई तकनीक का आविष्कार करने के साथ-साथ खेल महारण और सांस्कृतिक महारण के जरिए गांव की प्रतिभा को नई दिशा मिलेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि असम को देश के पांच श्रेष्ठ राज्यों में शामिल करना हमारा लक्ष्य है। उन्होंने युवाओं से दिल्ली को दोष देने की मानसिकता को त्याग कर और जातिगत विभाजन की सीमा को छोड़कर एकजुट होकर काम करने का आह्वान किया। महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव और स्वर्गदेव चाउलुंग चुकाफा के आदर्शों के अनुसार एक मजबूत और विकसित असम बनाने का संकल्प लेने के लिए उन्होंने युवाओं से अपील की।
आज के इस समारोह में ‘प्रज्ञा’ के अध्यक्ष प्रमोद कलिता, प्रसिद्ध लेखिका अन्नुराधा शर्मा पुजारी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक बशिष्ठ बजरबरूवा के साथ-साथ राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए अनेक युवा और बुद्धिजीवी शामिल हुए।
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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द राय
