पूर्णिया, 02 फ़रवरी (हि.स.)। पूर्णिया की सड़कों पर सोमवार को एक अलग तरह का रथ निकला। यह कोई धार्मिक यात्रा नहीं थी, न कोई राजनीतिक प्रचार। यह रथ था, बच्चों का बचपन बचाने की उम्मीद का प्रतीक। बाल विवाह मुक्ति रथ जब रवाना हुआ, तो उसके साथ सिर्फ सरकारी अभियान नहीं, बल्कि हजारों मासूम सपनों की रक्षा का संकल्प भी चला।

आज भी हमारे समाज में ऐसे घर हैं, जहां बेटियों का बचपन शादी की रस्मों में खो जाता है और बेटों का भविष्य जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाता है। कानून होने के बावजूद बाल विवाह की घटनाएं पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई हैं। यही कारण है कि पूर्णिया में शुरू हुआ यह अभियान केवल प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने की कोशिश है।
पुलिस अधीक्षक स्वीटी सहरावत ने साेमवार काे जब इस रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया, तो उनका संदेश स्पष्ट था बाल विवाह सिर्फ परंपरा नहीं, अपराध है। उन्होंने कहा कि कम उम्र में शादी बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन दोनों को नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने आम लोगों से अपील की कि अगर कहीं भी बाल विवाह की तैयारी दिखे, तो चुप न रहें, बल्कि आवाज उठाएं।
उन्हाेंने बताया कि यह रथ अगले 30 दिनों तक गांव-गांव, टोले-टोले और पंचायतों तक पहुंचेगा। वहां लोगों से संवाद होगा, मां-बाप को समझाया जाएगा, युवाओं को जागरूक किया जाएगा और बच्चों को उनके अधिकारों के बारे में बताया जाएगा। संदेश एक ही होगा। बचपन शादी के लिए नहीं, सपनों के लिए होता है। इस अभियान में सरकार के साथ कई सामाजिक संगठन भी जुड़े हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग, जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन, प्रयास जैक सोसाइटी और अन्य संस्थाएं मिलकर समाज को आईना दिखाने की कोशिश कर रही हैं। यह लड़ाई सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि सोच बदलने की है।
हिन्दुस्थान समाचार / नंदकिशोर सिंह
