डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दक्षिण एशिया की राजनीति में बांग्लादेश हमेशा से भारत का महत्वपूर्ण और संवेदनशील पड़ोसी रहा है। साल 1971 के मुक्ति संग्राम से लेकर पिछले एक दशक तक दोनों देशों के रिश्ते सहयोग, विश्वास और साझा हितों की मजबूत नींव पर खड़े रहे, किंतु हालिया राजनीतिक घटनाक्रम विशेषकर शेख हसीना के सत्ता से हटने, उनके भारत आने और अंतरिम सरकार के गठन ने इस संतुलन को बुरी तरह प्रभावित किया है। अब 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले बांग्लादेश में भारत-विरोध एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभर रहा है, इससे क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं।

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक और भावनात्मक रही है। साल 1971 के युद्ध में भारत ने प्रत्यक्ष सैन्य और कूटनीतिक सहयोग देकर बांग्लादेश के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई थी। यही कारण है कि दशकों तक दोनों देशों के बीच आपसी भरोसे का रिश्ता बना रहा। शेख हसीना के नेतृत्व में साल 2009 से 2023 के बीच भारत और बांग्लादेश के संबंध अपने सबसे मजबूत दौर में पहुंचे। इस अवधि में दोनों देशों के बीच व्यापार कई गुना बढ़ा, सीमा विवादों का समाधान हुआ और आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई को मजबूती मिली।
आंकड़ों के अनुसार, भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय व्यापार साल 2009 में लगभग 3 अरब डॉलर था, जो साल 2022-23 तक बढ़कर करीब 18 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारत, बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया। भारत ने बांग्लादेश को लगभग 8 अरब डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट भी दी, जिसके तहत सड़क, रेलवे, ऊर्जा और बंदरगाह परियोजनाओं पर काम हुआ।
इसके अलावा, सीमा समझौते के तहत साल 2015 में 162 एन्क्लेवों का आदान-प्रदान किया गया, जो दशकों पुराने विवाद का शांतिपूर्ण समाधान था लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद यह पूरा समीकरण तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। शेख हसीना के हटने और उनके भारत में शरण लेने की घटना ने बांग्लादेश की राजनीति में भारत को सीधे एक विवादित मुद्दा बना दिया है। जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) जैसे राजनीतिक दल हसीना को वापस भेजने की लगातार मांग कर रहे हैं। इस मांग को केवल एक कानूनी या राजनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं देखा जा रहा बल्कि इसे भारत के खिलाफ राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़कर पेश किया जा रहा है।
इसी के साथ, बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों की घटनाएं भी चिंता का विषय बन गई हैं। बांग्लादेश की कुल आबादी लगभग 17 से 18 करोड़ के बीच है, जिसमें हिंदुओं की संख्या लगभग 1.3 से 1.5 करोड़ मानी जाती है, यानी करीब 8-9 प्रतिशत। पिछले कुछ वर्षों में दुर्गा पूजा के दौरान मंदिरों पर हमलों, मूर्तियों को तोड़ने और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की कई घटनाएं सामने आई हैं। कुछ मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 से 2025 के बीच ऐसे मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इस बीच 100 से अधिक टारगेटेड हिंदू हत्याएं की गईं। इस्लामी अतिवादियों द्वारा घर जलाने, संपत्ति हड़पने और उसे नुकसान पहुंचाने की घटनाओं की बात करें तो आंकड़े बहुत भयंकर हैं, यह 10000 को पार कर चुके हैं।
हालांकि अंतरिम सरकार इन घटनाओं को सांप्रदायिक हिंसा मानने से बचती रही है और उन्हें व्यक्तिगत विवाद या स्थानीय झगड़ों का परिणाम बताती रही है, लेकिन इन घटनाओं से भारत में यह धारणा मजबूत हो रही है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा कमजोर हो रही है और सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही।
अंतरिम सरकार के प्रमुख डॉ. मोहम्मद यूनुस और उनके सलाहकारों के हालिया बयानों ने भी भारत-बांग्लादेश संबंधों में दूरी की झलक दिखाई है। कई मौकों पर यह कहा गया कि बांग्लादेश को किसी छोटे देश की तरह न समझा जाए और वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति चलाने में सक्षम है। कुछ बयानों में यह भी संकेत दिया गया कि बांग्लादेश की आबादी और सामरिक स्थिति उसे क्षेत्र में एक मजबूत देश बनाती है। ऐसे में वह भारत से हर मोर्चे पर निपटने के लिए तैयार है- इस तरीके की सोच भारत को अप्रत्यक्ष रूप से धमकी देना भी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले इस तरह की बयानबाजी इस्लामी जिहादियों और कट्टर वादियों को भावनाओं को उभारने के लिए की जा रही है। भारत के खिलाफ लिए जा रहे कुछ अन्य फैसले और रुख भी इसी बदलाव की ओर इशारा करते हैं। व्यापारिक समझौतों की समीक्षा की बात उठ रही है। सीमा प्रबंधन को लेकर सख्ती बढ़ाई गई है। कुछ राजनीतिक संगठनों ने भारत के खिलाफ जनसभाएं और अभियान भी शुरू किए हैं। यह माहौल धीरे-धीरे ऐसे राजनीतिक नैरेटिव को जन्म दे रहा है जिसमें भारत को एक बाहरी प्रभाव और शत्रुदेश के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा पहलू धार्मिक और सामाजिक पहचान की राजनीति भी है। बांग्लादेश के संविधान में लंबे समय से धर्मनिरपेक्षता और इस्लामी पहचान के बीच संतुलन बना हुआ था लेकिन अब इस विषय पर नई बहस शुरू हो गई है। कुछ कट्टरपंथी संगठन देश को अधिक इस्लामी पहचान देने की बात कर रहे हैं, हालांकि अंतरिम सरकार ने साफ किया है कि शरिया कानून लागू करने की कोई योजना नहीं है। फिर भी अल्पसंख्यक संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के खिलाफ दिए जा रहे तीखे बयान सामाजिक तनाव को बढ़ा रहे हैं। जब हिंदू-बौद्ध-क्रिश्चियन समुदाय से जुड़े संगठनों को राजनीतिक रूप से निशाना बनाया जाता है तब इससे देश के भीतर असुरक्षा का माहौल बनना स्वभाविक है। इसका असर भारत में भी महसूस किया जा रहा है क्योंकि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध गहरे हैं।
भारत के लिए यह स्थिति कूटनीतिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण है। एक तरफ वह अपने पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता, दूसरी तरफ उसे वहां रहने वाले हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर चिंता भी है। इसके अलावा, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। भारत-बांग्लादेश के बीच लगभग 4096 किलोमीटर लंबी सीमा है जोकि भारत की सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में से एक है। इस सीमा की स्थिरता भारत की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
आर्थिक दृष्टि से भी दोनों देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं। बांग्लादेश भारत से पेट्रोलियम उत्पाद, कपास, मशीनरी और खाद्य सामग्री का बड़ा आयातक है। वहीं, भारत के लिए बांग्लादेश एक बड़ा निर्यात बाजार है। यदि राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो इसका असर दोनों देशों के व्यापार पर पड़ सकता है। 12 फरवरी के चुनाव इस पूरे परिदृश्य को तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यदि चुनाव के बाद ऐसी सरकार बनती है जो भारत के साथ संतुलित और सहयोगपूर्ण संबंध बनाए रखना चाहती है, तो वर्तमान तनाव कम हो सकता है। लेकिन यदि भारत-विरोधी राजनीति को जनसमर्थन मिलता है तो आने वाले वर्षों में संबंधों में और खटास आ सकती है।
यह भी सच है कि बांग्लादेश अपनी राष्ट्रीय पहचान और स्वतंत्र नीति को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। हर देश का यह अधिकार है कि वह अपनी विदेश नीति तय करे। लेकिन जब यह प्रक्रिया पड़ोसी देशों के खिलाफ तीखी बयानबाजी और नकारात्मक राजनीतिक अभियान के रूप में सामने आती है तो इससे क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित होती है। फिर यह स्थिति केवल भारत और बांग्लादेश के रिश्तों का सवाल नहीं है बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता का भी मुद्दा है। यदि दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ता है तो इसका असर क्षेत्रीय सुरक्षा, व्यापार और विकास पर पड़ेगा।
वस्तुत: आज की स्थिति यह संकेत दे रही है कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते नए मोड़ पर खड़े हैं। यह मोड़ सहयोग और साझेदारी की ओर भी जा सकता है और टकराव की दिशा में भी। आने वाले चुनाव और उसके बाद बनने वाली सरकार इस बात को तय करेगी कि दक्षिण एशिया के ये दो महत्वपूर्ण पड़ोसी किस रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। फिलहाल बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की तरफ से बार-बार भारत विरोध की कोशिश हो रही है, इससे नुकसान भारत की तुलना में बांग्लादेश का अधिक है। यह बात उसे अभी समझ नहीं आ रही। वह अभी पाकिस्तान और चीन की गोद में खेल रहा है, यह सभी को दिखाई दे रहा है।
बांग्लादेश में हिंदुओं की हालत भयंकर रूप से खराब है और उनके सामने जीवन का संकट बना हुआ है। ऐसे में भारत सरकार का यह दायित्व है कि वह अपनी जिम्मेदारी को समझे, कम से कम 1947 में हुआ भारत विभाजन इस शर्त पर तो नहीं हुआ था कि जो जहां है वह अल्पसंख्यक होने के नाते वहाँ प्रताड़ित किया जाएगा और उसके प्रति बार-बार हिंसा घटेगी इसलिए भारत सरकार की ओर से सख्त निर्णय लेना आज के समय की जरूरत है, जिसे बिना किसी देरी के केंद्र की मोदी सरकार को बांग्लादेश के प्रति लेना चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
