
बलरामपुर, 19 मार्च (हि.स.)। चैत्र नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले का सरहदी नगर रामानुजगंज पूरी तरह भक्ति में डूब गया है। कन्हर नदी तट पर स्थित मां महामाया मंदिर और मालकेतु पर्वत पर विराजित पहाड़ी माई मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण झारखंड सहित आसपास के राज्यों से भी बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंच रहे हैं, जिससे पूरा इलाका आस्था और उत्साह से सराबोर नजर आ रहा है।

चैत्र नवरात्रि के पहले दिन रामानुजगंज में श्रद्धा का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। कन्हर नदी के पवित्र तट पर स्थित मां महामाया मंदिर में तड़के सुबह से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया। स्नान कर भक्त पूरे विधि-विधान से माता की पूजा-अर्चना करते नजर आए। मंदिर परिसर में घंटियों की गूंज, मंत्रोच्चार और जयकारों से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठा।
यह मंदिर न केवल स्थानीय आस्था का केंद्र है, बल्कि इसकी पहचान दूर-दराज के राज्यों तक फैली हुई है। सरहदी क्षेत्र होने के चलते झारखंड के सटे इलाकों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचे। नवरात्रि के पहले ही दिन जिस तरह श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा, उसने इस धाम की लोकप्रियता और विश्वास को एक बार फिर प्रमाणित कर दिया।
मां महामाया मंदिर का इतिहास भी बेहद गौरवशाली रहा है। वर्ष 1935 में सरगुजा रियासत के तत्कालीन महाराज रामानुज शरण सिंह देव ने इस मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कराई थी। उस समय यह क्षेत्र का प्रमुख और एकमात्र देवी मंदिर था। समय के साथ श्रद्धालुओं की आस्था गहराती गई और आज यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में स्थापित हो चुका है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है, जिसके कई उदाहरण भक्तों के अनुभवों में देखने को मिलते हैं।
मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। वर्षों से एक ही परिवार इस परंपरा को निभा रहा है। केदारनाथ पांडे ने चार दशकों तक यहां सेवा दी, उनके बाद उनके पुत्र नंदलाल पांडे और अब उनके पौत्र जितेंद्र पांडे इस जिम्मेदारी को संभाल रहे हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता का भी प्रतीक बन चुकी है।
मंदिर परिसर में महामाया माता के साथ-साथ शीतला माता, काली माता, संतोषी माता, दक्षिणमुखी हनुमान, माता सती और भगवान शंकर के भी मंदिर स्थित हैं, जहां श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। नवरात्रि के दौरान इन सभी मंदिरों में विशेष पूजा और अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है, जिससे पूरे परिसर में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।
इधर, वार्ड क्रमांक 13 स्थित मालकेतु पर्वत पर विराजित पहाड़ी माई मंदिर में भी आस्था का वही उत्साह देखने को मिला। सुबह से ही भक्त कतारों में खड़े होकर माता के दर्शन के लिए पहुंचते रहे। सात पहाड़ियों से घिरा यह मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। चारों ओर हरियाली, नीचे फैला रामानुजगंज जलाशय और बहती कन्हर नदी का दृश्य यहां आने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति के साथ-साथ प्राकृतिक आनंद भी प्रदान करता है।
पहाड़ी माई मंदिर तक पहुंचने का सफर भी अपने आप में एक प्रेरणादायक कहानी समेटे हुए है। पहले यहां पहुंचना बेहद कठिन था, लेकिन स्थानीय लोगों ने श्रमदान और चंदा एकत्र कर वर्ष 2016 में सड़क का निर्माण कराया। बाद में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सीढ़ियां भी बनाई गईं, जिनमें कई लोगों ने अपने नाम से योगदान दिया। यह पहल स्थानीय एकजुटता और आस्था की मिसाल बन गई है।
नवरात्रि के अवसर पर दोनों ही मंदिरों में भक्तों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि समय के साथ श्रद्धा और विश्वास और अधिक प्रगाढ़ होता जा रहा है। रामानुजगंज इन दिनों सिर्फ एक नगर नहीं, बल्कि आस्था का जीवंत केंद्र बन गया है, जहां हर कदम पर भक्ति की अनुभूति होती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय
