—नदी और दलदली जगहों पर रहने वाली भैंसों की जेनेटिक इतिहास की जांच की

वाराणसी, 06 मार्च (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के जंतु विज्ञान विभाग के ज्ञान लैब में कार्यरत शोध छात्र शैलेश देसाई ने हाल ही में यूनाइटेड किंगडम के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पांच महीने का शोध दौरा पूरा किया। यह दौरा अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 तक रहा, जिसके दौरान उन्होंने प्राचीन डीएनए तकनीकों का उपयोग कर एनिमल डोमेस्टिकशन के इतिहास पर अध्ययन किया। यह यात्रा बीएचयू की इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस (आईओई) योजना के तहत समर्थित थी।
ऑक्सफोर्ड में छात्र शैलेष ने पुरातत्व विद्यालय के प्रोफेसर ग्रेगर लार्सन के प्रयोगशाला में कार्य किया। प्रोफेसर लार्सन एनिमल डोमेस्टिकशन अध्ययनों में अग्रणी विशेषज्ञ हैं और प्राचीन डीएनए पद्धतियों के एनिमल डोमेस्टिकशन के जनक माने जाते हैं। उनके द्वारा बनाए गए तरीकों को एनिमल डोमेस्टिकशन की जांच के लिए किया जाता है।
शुक्रवार को यह जानकारी बीएचयू के जनसम्पर्क कार्यालय ने दी। बताया गया कि ऑक्सफोर्ड के शोध मे शैलेश ने भैंस के जेनेटिक इतिहास पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में भैंसों की उत्पत्ति और डोमेस्टिकशन प्रक्रियाओं को समझने पर काम किया, साथ ही यह जांचा कि भैंसें पश्चिम एशिया में कब और कैसे पहुंचीं, जिसमें ईरान, इराक, इटली और मिस्र जैसे क्षेत्र शामिल हैं। हालांकि ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य भारतीय उपमहाद्वीप और पश्चिम एशिया के बीच लंबे समय से समुद्री सम्पर्कों की ओर इशारा करते हैं। लेकिन इन क्षेत्रों में भैंसों की पहुंच का समय और आनुवंशिक विशेषताएं अभी तक अबूझ पहेली हैं।
इसके अलावा, उन्होंने नदी और दलदली जगहों पर रहने वाली भैंसों की जेनेटिक इतिहास की जांच की, जिसमें पूर्वी एशिया की आबादियां भी शामिल हैं। शोध यात्रा के दौरान, उन्होंने प्रोफेसर लार्सन की प्राचीन डीएनए प्रयोगशाला में डीएनए डेटा उत्पन्न किया। प्राचीन डीएनए अनुसंधान में पुरातात्विक और ऐतिहासिक नमूनों जैसे हड्डियों, बालों और त्वचा से आनुवंशिक सामग्री निकालना शामिल होता है, जिसके लिए विशेष प्रयोगशाला सुविधाओं की आवश्यकता होती है। उनका शोध भारत में एनिमल पैलियोजेनोमिक्स को आस्थापित करने मे मदद करेगा। भैंस डोमेस्टिकशन के अलावा, शैलेश ने भारत में सूअर डोमेस्टिकशन पर अध्ययनों में भी योगदान दिया है। इसके अतिरिक्त, गुजराती लोगों के आनुवंशिक विश्लेषण के माध्यम से उन्होंने आर्य आक्रमण मॉडल की परिकल्पना को चुनौती देने वाली शोध में योगदान दिया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी
