
भोपाल, 08 फरवरी (हि.स.)। राजधानी भोपाल स्थित मप्र जनजातीय संग्रहालय में नृत्य, गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि संभावना का आयोजन किया जाता है। इस रविवार को राजगढ़ जिले के महेश मालवीय एवं साथी कलाकारों द्वारा कबीर गायन, दतिया जिले के विनोद सेन एवं साथियों द्वारा लांगुरिया गायन, भोपाल से देवी भजन एवं राखी बांके एवं साथियों द्वारा गणगौर नृत्य और धार जिले से कृष्णा मालीवाड और साथियों द्वारा भगोरिया नृत्य की प्रस्तुति दी गई।

भगोरिया नृत्य

मध्य प्रदेश के मालवा एवं झाबुआ और अलीराजपुर क्षेत्र में निवास करने वाली भील जनजाति का भगोरिया नृत्य, भगोरिया हाट में होली तथा अन्य अवसरों पर भील युवक-युवतियों द्वारा किया जाता है। फागुन के मौसम में होली से पूर्व भगोरिया हाटों का आयोजन होता है। भगोरिया नृत्य में विविध पदचाप समूहन पाली, चक्रीपाली तथा पिरामिड नृत्य मुद्राएं आकर्षण की केन्द्र होती हैं। रंग-बिरंगी वेशभूषा में सजी-धजी युवतियों का श्रृंगार और हाथ में तीरकमान लिये नाचना ठेठ पारम्परिक व अलौकिक सरंचना है।
गणगौर
गणगौर निमाड़ी जन-जीवन का गीति काव्य है। चैत्र दशमी से चैत्र सुदी तृतीया तक पूरे नौ दिनों तक चलने वाले इस गणगौर उत्सव का ऐसा एक भी कार्य नहीं, जो बिना गीत के हो। गणगौर के रथ सजाये जाते हैं, रथ दौड़ाये जाते हैं। इसी अवसर पर गणगौर नृत्य भी किया जाता है। झालरिया दिये जाते हैं। महिला और पुरूष रनुबाई और धणियर सूर्यदेव के रथों को सिर पर रखकर नाचते हैं। ढोल और थाली वाद्य गणगौर के केन्द्र होते हैं। गणगौर निमाड़ के साथ राजस्थान, गुजरात, मालवा में भी उतना ही लोकप्रिय है।
गौरतलब है कि मप्र जनजातीय संग्रहालय़ में हर रविवार दोपहर 02 बजे से आयोजित होने वाली इस गतिविधि में प्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति दी जाती है। इसके अलावा देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को देखने समझने का अवसर भी जनसामान्य को प्राप्त होता है।
हिन्दुस्थान समाचार / उम्मेद सिंह रावत
