– प्रद्युम्न शर्मा

हर वर्ष आठ मार्च को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं के अधिकारों, समानता और सम्मान के संघर्ष का प्रतीक है। यह दिन समाज को यह याद दिलाने का अवसर भी है कि महिलाओं की भागीदारी और सशक्तिकरण के बिना समावेशी विकास संभव नहीं है। इसी सोच को व्यवहार में उतारने की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। राज्य सरकार ने इस विशेष प्रसंग के अवसर पर प्रतिवर्ष प्रदेश की ग्राम पंचायतों में विशेष ग्राम सभाओं का आयोजन किया जाना सुनिश्चित किया है। इन ग्राम सभाओं का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा करना और स्थानीय स्तर पर ठोस निर्णय लेना है।
मध्यप्रदेश में पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। ग्रामीण स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए न्यूनतम पचास प्रतिशत पदों के आरक्षण की व्यवस्था की गई है। वर्तमान त्रिस्तरीय पंचायतों के पंचवर्षीय कार्यकाल में निर्वाचित महिला पंचायत प्रतिनिधियों का प्रतिशत पचास से भी अधिक, लगभग बावन प्रतिशत है। यह स्थिति दर्शाती है कि पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है और वे अब केवल औपचारिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाली ग्राम सभाओं को सार्थक और प्रभावी बनाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी इन्हीं महिला पंचायत प्रतिनिधियों के कंधों पर है। यदि वे सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभाती हैं, तो ग्राम स्तर पर महिलाओं से जुड़े मुद्दों के समाधान की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति संभव है।
यदि हम एक नजर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर डालें तो इसका इतिहास महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष से जुड़ा हुआ है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में यूरोप और उत्तरी अमेरिका में महिला श्रमिकों ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किए थे। इन आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य कार्य के बेहतर घंटे, उचित पारिश्रमिक और समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता को समाप्त करना था। धीरे-धीरे यह आंदोलन वैश्विक स्तर पर फैल गया और महिलाओं के अधिकारों की आवाज मजबूत होती गई। वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया और उसी वर्ष आठ मार्च को आधिकारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। तब से यह दिन दुनिया भर में महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मान देने और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है।
पंचायतों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद एक महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर सामने आता है कि क्या महिला पंचायत प्रतिनिधि वास्तव में स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन कर रही हैं। कई स्थानों पर महिलाएं सक्रिय रूप से पंचायत के कार्यों में भाग ले रही हैं और विकास योजनाओं के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, किंतु कुछ जगहों पर अभी भी ऐसी स्थिति देखने को मिलती है जहां महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिवार के पुरुष सदस्य पंचायत के निर्णय लेते हैं और कार्यों का संचालन करते हैं। इसे प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व कहा जाता है। यह स्थिति महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण में बाधा उत्पन्न करती है। इसलिए महिला पंचायत प्रतिनिधियों का क्षमता संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। उन्हें योजनाओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और कानूनों की जानकारी देकर आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाना जरूरी है।
महिला सशक्तिकरण के लिए समाज की सक्रिय भूमिका भी आवश्यक है। महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना समय की मांग है। आज महिला साक्षरता पहले की तुलना में काफी आगे बढ़ी है, किंतु सिर्फ साक्षरता ही पर्याप्त नहीं। महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर और सामाजिक सम्मान मिलना भी जरूरी है। साथ ही पारंपरिक सामाजिक सोच और पुरुषों के अनावश्यक हस्तक्षेप को भी कम करना होगा, ताकि महिलाएं स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम बन सकें।
ग्राम सभाएं ग्रामीण लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती हैं। यही वह मंच है जहां गांव के विकास से जुड़े निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित विशेष ग्राम सभाएं महिलाओं के मुद्दों पर चर्चा करने का एक प्रभावी मंच बन सकती हैं। इन सभाओं में महिला पंचायत प्रतिनिधियों के साथ-साथ गांव की अन्य महिलाओं और किशोरी बालिकाओं की समस्याओं, आवश्यकताओं और संभावनाओं पर भी खुलकर चर्चा की जा सकती है। इससे स्थानीय स्तर पर समाधान खोजने और महिलाओं के हित में ठोस निर्णय लेने का अवसर मिलता है।
इन विशेष ग्राम सभाओं को प्रेरणादायक और परिणामकारी बनाने के लिए कई सकारात्मक पहलें की जा सकती हैं। गांव में उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं और किशोरी बालिकाओं को सम्मानित किया जा सकता है, जिससे अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। इसके अलावा महिलाओं की आजीविका, कौशल विकास और शिक्षा से जुड़े विषयों पर चर्चा की जा सकती है। महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान से जुड़े मुद्दों पर भी ग्राम स्तर पर महत्वपूर्ण संकल्प लिए जा सकते हैं।
ग्राम सभाओं की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि गांव की अधिक से अधिक महिलाएं इसमें भाग लें। इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ग्राम सभा के आयोजन की सूचना गांव की सभी महिलाओं तक पहुंचे। महिला स्वसहायता समूहों की सक्रिय भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ये समूह ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इन ग्राम सभाओं में महिलाओं को उनके अधिकारों से जुड़े कानूनों की जानकारी देना भी अत्यंत आवश्यक है। दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 और कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित कानूनों के बारे में जानकारी देकर महिलाओं को जागरूक बनाया जा सकता है। इसके साथ-साथ सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, नारी सशक्तिकरण मिशन और वन स्टॉप सेंटर जैसी सुविधाओं के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है।
राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार इन ग्राम सभाओं में कई सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर भी चर्चा की जाएगी। इनमें बाल विवाह की रोकथाम, किशोरी बालिकाओं के स्वास्थ्य और पोषण, धात्री माताओं की देखभाल, एनीमिया से पीड़ित महिलाओं और किशोरियों के उपचार तथा व्यक्तिगत स्वच्छता जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। इसके साथ ही महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि सरकारी योजनाओं में महिला हितग्राहियों को प्राथमिकता मिले।
यदि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित इन विशेष ग्राम सभाओं के माध्यम से पंचायतें महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा और विकास को प्राथमिकता देने का संकल्प लें और उसे व्यवहार में भी लागू करें, तब जरूर ये उम्मीद दिखाई देती है कि आने वाले समय में कई ग्राम पंचायतें “महिला हितैषी ग्राम पंचायत” के रूप में विकसित हो सकती हैं।
(लेखक पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सेवानिवृत्त अतिरिक्त संचालक हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
