-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के हक पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- “अब समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने का समय आ गया है।” के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने यूसीसी का विरोध करते हुए कई बयान दिए हैं। उन्होंने कहा कि “यूसीसी के नाम पर हिंदू कानून मुसलमानों पर लागू नहीं किया जा सकता” और “इस्लाम में शादी महज एक कॉन्ट्रैक्ट है, यह जन्म-जन्म का बंधन नहीं है। यह जिम्मेदारी नहीं है।…निकाह हमारे के लिए धार्मिक संस्कार नहीं है।”
अब सवाल यह है कि क्या यूसीसी वास्तव में किसी धर्म को निशाना बनाने की कोशिश है या फिर यह संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को लागू करने की दिशा में एक कदम है? वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में समान नागरिक कानून पहले से लागू है। ऐसे में ओवैसी का ये विरोध साफ बता रहा है कि वह देश में इस्लाम के नाम पर अपने लिए वे एक विशेष अधिकार चाहते हैं, वह देश की जनसंख्या में 20 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी अल्पसंख्यक बने रहना चाहते हैं और उसमें भी वे रिलीजन के नाम पर अलग स्वतंत्रता चाहते हैं।
यहां सीधे तौर पर यहां स्पष्ट होता है कि उन्हें देश की समानता से कोई मतलब नहीं है! इसलिए वे यह भी कह रहे हैं कि यदि हिंदू विवाह कानून को आधार बनाकर यूसीसी लागू किया गया तो वह मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। ओवैसी इतना कहने के बाद भी नहीं रुकते हैं, इसके अलावा भी वे बहुत कुछ कहते हैं। देखा जाए तो पहली नजर में ये बातें धार्मिक स्वतंत्रता की चिंता के रूप में सामने आती हैं, लेकिन गहराई से देखने पर यह तर्क कई स्तरों पर सवालों के घेरे में आ जाता है।
ओवैसी का सबसे बड़ा तर्क यह है कि यूसीसी के नाम पर “हिंदू कानून” मुसलमानों पर लागू किया जाएगा, लेकिन यह तर्क स्वयं ही गलत आधार पर खड़ा है। समान नागरिक संहिता का अर्थ किसी एक धर्म के कानून को दूसरे धर्म पर थोपना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है; एक ऐसा नागरिक कानून जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। इसमें विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे मामलों में समान नियम लागू होते हैं। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस व्यवस्था को समानता और लैंगिक न्याय को मजबूत करने का माध्यम माना जाता है।
यदि वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो दुनिया के अधिकांश देशों में किसी न किसी रूप में समान नागरिक कानून लागू है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में लगभग 193 देश हैं और इनमें से बड़ी संख्या में विवाह, तलाक और संपत्ति के मामलों में धर्म आधारित अलग-अलग कानून नहीं हैं। उदाहरण के लिए फ्रांस, जर्मनी, इटली, सपेन, पुर्तगाल, जापान, स्विट्ज़रलैंड, ब्राजील, रूस, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों में एक ही सिविल कोड सभी नागरिकों पर लागू होता है।
फ्रांस में तो इसे 1804 में ही लागू कर दिया था, नेपोलियन सिविल कोड आधुनिक सिविल कानून की नींव के चलते आगे इसके कारण से यूरोप और लैटिन अमेरिका के कई देशों की कानूनी व्यवस्था प्रभावित हुई। इन देशों में विवाह केवल सिविल प्रक्रिया के माध्यम से ही मान्य होता है और तलाक तथा संपत्ति के अधिकार भी एक समान कानून से नियंत्रित होते हैं। यही कारण है कि आधुनिक लोकतांत्रिक देशों में धर्म और कानून को अलग रखने की प्रवृत्ति अधिक मजबूत दिखाई देती है।
प्रश्न यह है कि यदि दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में नागरिक कानूनों को धर्म से अलग रखा गया है और सभी नागरिकों पर ये समान रूप से लागू होते हैं। वहां यदि इन समान कानूनों को लोकतंत्र और आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है, तब भारत में इसे “धर्म पर हमला” बताना कितना तर्कसंगत है?
ऐसे में कहना यही होगा कि ओवैसी के बयान देखने में भले ही कानूनी तर्क की बात धार्मिक पहचान के आधार पर करता हुआ दिखाई दे, लेकिन यह सीधे तौर पर राजनीति है। जब वे कहते हैं कि “मुझे अपने धर्म के मुताबिक चलना चाहिए”, तो यह तर्क व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता की बात तो करता है, लेकिन यह भी सवाल उठाता है कि क्या नागरिक कानून केवल धार्मिक पहचान के आधार पर तय होना चाहिए?
अवैसी ये कैसे भूल सकते हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है, यहां कानून का आधार नागरिकता है, न कि धर्म? अगर हर समुदाय अपने-अपने धार्मिक कानूनों के अनुसार अलग कानूनी व्यवस्था की मांग करेंगे तब फिर देश में समानता का संवैधानिक सिद्धांत कहां रह जाता है? यही कारण है कि संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कही गई है। संविधान निर्माताओं का मानना था कि एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य में नागरिकों के लिए समान कानून होना चाहिए।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि दुनिया के कई मुस्लिम-बहुल देशों में भी पारिवारिक कानून में बड़े सुधार हुए हैं। उदाहरण के लिए तुर्की ने 1926 में आधुनिक नागरिक कानून अपनाया और शरिया अदालतों को समाप्त कर दिया। इसी तरह ट्यूनीशिया ने 1956 में पर्सनल स्टेटस कोड लागू किया, जिसके तहत बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया और महिलाओं को अधिक अधिकार दिए गए।
इस प्रकार वैश्विक अनुभव यह बताता है कि समान नागरिक संहिता की अवधारणा मुख्य रूप से आधुनिक राष्ट्र-राज्य की उस सोच से जुड़ी है जिसमें नागरिकों को धर्म के आधार पर अलग-अलग कानूनों के बजाय एक समान कानूनी ढाँचे के अंतर्गत रखा जाता है। समान नागरिक कानून को सामान्यतः नागरिक समानता, लैंगिक न्याय और आधुनिक कानूनी व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है, इसलिए औवेसी का यह कहना कि यूसीसी का विचार किसी धर्म के खिलाफ है, पूरी तरह सही नहीं लगता है।
यूसीसी के समर्थन का एक बड़ा तर्क महिलाओं के अधिकारों से भी जुड़ा है। अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण कई बार महिलाओं को समान अधिकार नहीं मिल पाते। मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर कई बार अदालतों में बहस हो चुकी है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में टिप्पणी करते हुए कहा कि देश में यूसीसी पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है। अगर एक समान कानून लागू होता है तो इससे महिलाओं को विवाह, तलाक और संपत्ति के मामलों में अधिक समान अधिकार मिल सकते हैं।
इसी संदर्भ में अक्सर गोवा और उत्तराखण्ड का उदाहरण दिया जाता है, जहां गोवा एवं उत्तराखण्ड सिविल कोड सभी समुदायों पर लगभग समान रूप से लागू होता है, जोकि यह दिखाता है कि भारत में भी समान नागरिक कानून का मॉडल संभव है। देश में यूसीसी को न्याय, समानता और आधुनिक कानूनी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए लागू किया जाना है, इसलिए इसे लागू होना ही चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
