नई दिल्ली, 13 मार्च (हि.स.)। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा कि राजस्व सेवा के अधिकारी देश की वित्तीय शक्ति के संरक्षक होते हैं और देश के विकास कार्यों की आधारशिला कर राजस्व से ही मजबूत होती है।

भारतीय राजस्व सेवा (आयकर) के 79वें बैच के अधिकारी प्रशिक्षुओं ने उपराष्ट्रपति से उपराष्ट्रपति भवन में भेंट की। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि देश में होने वाले विकास कार्य चाहे वह बुनियादी ढांचे का निर्माण हो, ग्रामीण और शहरी विकास हो या सामाजिक कल्याण की योजनाएं सभी कर राजस्व से संभव होते हैं, इसलिए कर प्रशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे यह सुनिश्चित करें कि कर चोरी न हो, लेकिन साथ ही ईमानदार करदाताओं को अनावश्यक परेशानी का सामना भी न करना पड़े।
उन्होंने कहा कि अवैध आय की पहचान करना और उस पर उचित कार्रवाई करना राजस्व अधिकारियों का दायित्व है, लेकिन जो लोग ईमानदारी से कर अदा करते हैं, उन्हें सम्मान और सहयोग मिलना चाहिए। उपराष्ट्रपति ने कहा कि ईमानदार करदाता देश के सबसे बड़े देशभक्तों में से होते हैं और उन्हें हमेशा सम्मानजनक व्यवहार मिलना चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत तेजी से प्रगति कर रहा है और देश में व्यापक स्तर पर संपत्ति का सृजन हो रहा है। बुनियादी ढांचे का विस्तार हो रहा है तथा ग्रामीण और शहरी विकास भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास के साथ-साथ राजस्व में भी वृद्धि होती है, ऐसे में राजस्व अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
कर प्रशासन में प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि डिजिटल भुगतान और तकनीकी प्रणालियों के विस्तार के बावजूद कुछ लोग अभी भी व्यवस्था का दुरुपयोग कर कर चोरी करने का प्रयास करते हैं। ऐसे मामलों की पहचान करना और यह सुनिश्चित करना कि देय कर का भुगतान हो, कर अधिकारियों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
देश की सुशासन परंपरा का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्री कौटिल्य की शिक्षाओं का संदर्भ दिया। उन्होंने कहा कि कौटिल्य ने कराधान को मधुमक्खियों के कार्य के समान बताया था—जिस प्रकार मधुमक्खियां फूलों को नुकसान पहुंचाए बिना उनसे केवल उचित मात्रा में रस ग्रहण करती हैं, उसी प्रकार कराधान भी संतुलित और न्यायपूर्ण होना चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि वह दौर अब समाप्त हो चुका है जब व्यक्तिगत आय पर कर की दरें 90 प्रतिशत से अधिक हुआ करती थीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि कर प्रणाली पारदर्शी, निष्पक्ष और करदाता हितैषी होनी चाहिए, लेकिन साथ ही कर चोरी के मामलों से सख्ती से निपटना भी आवश्यक है।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस वक्तव्य का भी उल्लेख किया, जो उन्होंने ‘सेवा तीर्थ’ के उद्घाटन के समय दिया था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि सेवा की भावना भारत की आत्मा और उसकी पहचान है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि अधिकारी प्रशिक्षुओं को “सेवा परमोधर्मः” के सिद्धांत को अपने जीवन और कार्य का मार्गदर्शक बनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में आयकर सेवा के अधिकारियों को डिजिटल लेन-देन, वैश्विक कंपनियों, क्रिप्टोकरेंसी और सीमा-पार वित्तीय संरचनाओं जैसे जटिल विषयों से भी निपटना होगा। इसलिए अधिकारियों को निरंतर सीखते रहने और अपनी क्षमता को विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने प्रशिक्षुओं को सरकार के क्षमता निर्माण मंच आईजीओटी का अधिकतम उपयोग करने की सलाह दी।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारियों के पास विशेष कौशल और विशेषज्ञता होती है, जो उन्हें वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण शक्ति बनाती है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का सपना केवल सरकार के प्रयासों से नहीं बल्कि नागरिकों और संस्थाओं के सामूहिक प्रयासों से ही साकार होगा।
इस अवसर पर केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के अध्यक्ष रवि अग्रवाल, सदस्य (प्रशासन) पकंज कुमार मिश्रा, प्रधान महानिदेशक (प्रशिक्षण) अनिता सिन्हा तथा राष्ट्रीय प्रत्यक्ष कर अकादमी के महानिदेशक सिबिचेन के. मैथ्यू सहित कुल 183 अधिकारी प्रशिक्षु उपस्थित थे। इनमें भूटान की रॉयल सेवा के दो अधिकारी प्रशिक्षु भी शामिल थे।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार
