डॉ. प्रियंका सौरभ

आज के समय में अगर कोई सबसे तेजी से फैलने वाली चीज है तो वह है—’बकवास’। फर्क बस इतना है कि अब यह बकवास चाय की दुकानों या चौपालों तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्मार्टफोन की स्क्रीन पर सजकर ‘रील’ और ‘व्लॉग’ के नाम से पूरे समाज में ब्रॉडकास्ट हो रही है। एक समय था जब युवा अपने सपनों के लिए जागते थे। आज वे नोटिफिकेशन के लिए जागते हैं। पहले लक्ष्य तय होते थे, अब ट्रेंड तय होते हैं। पहले मेहनत पर ताली बजती थी, अब बकवास पर लाइक और शेयर मिलते हैं। यही वह बदलाव है, जिसने युवा पीढ़ी को धीरे-धीरे एक ऐसी दिशा में धकेल दिया है, जहां शोर तो बहुत है, लेकिन सार बिल्कुल नहीं। रील और व्लॉग जो मूल रूप से रचनात्मकता और अभिव्यक्ति के माध्यम हो सकते थे, आज एक ऐसी दौड़ का हिस्सा बन चुके हैं, जहां गुणवत्ता नहीं, बल्कि ‘वायरल’ होना सबसे बड़ा लक्ष्य है। इस दौड़ में कंटेंट नहीं, कंटेंट का शोर मायने रखता है। जितना ज्यादा विचित्र, जितना ज्यादा सनसनीखेज, उतनी ही ज्यादा लोकप्रियता। ऐसे में गंभीरता, संवेदनशीलता और ज्ञान जैसे शब्द धीरे-धीरे हाशिये पर चले जाते हैं।
युवा पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा आज ‘कंटेंट क्रिएटर’ बनने की होड़ में है, लेकिन यह कोई नहीं सोच रहा कि वे क्या बना रहे हैं और क्यों बना रहे हैं। कैमरा ऑन होते ही अभिनय शुरू हो जाता है और कैमरा ऑफ होते ही वास्तविकता का खालीपन सामने आ जाता है। यह एक ऐसी दुनिया है, जहां दिखावा ही असली पहचान बन चुका है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस बकवास को अब सामान्य और स्वीकार्य मान लिया गया है। जो जितना अधिक समय स्क्रीन पर बिताता है, उसे उतना ही ‘अपडेटेड’ माना जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि यह अपडेट नहीं, बल्कि एक प्रकार की मानसिक थकान और दिशाहीनता है।
आज का युवा घंटों यह सोचने में लगा रहता है कि अगली रील में क्या दिखाना है, लेकिन यह सोचने का समय नहीं निकालता कि जीवन में क्या करना है। यह विडंबना ही है कि जिस पीढ़ी के पास सबसे अधिक संसाधन हैं, वही सबसे अधिक भ्रमित और बिखरी हुई दिखाई देती है। यह समस्या केवल समय की बरबादी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सोचने की क्षमता को भी प्रभावित कर रही है। लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत ने ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कमजोर कर दिया है। गहराई से सोचने, पढ़ने और समझने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है।
व्लॉग और रील्स के इस दौर में एक और खतरनाक प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है—दूसरों की नकल। मौलिकता की जगह कॉपी-पेस्ट ने ले ली है। कोई ट्रेंड चल पड़ा, तो हर कोई उसी को दोहराने लगता है। इस प्रक्रिया में न तो कुछ नया पैदा होता है और न ही कोई सार्थक संदेश जाता है। बस एक जैसी बकवास का अंबार लग जाता है। समाज पर इसका प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। संवाद की जगह प्रदर्शन ने ले ली है। लोग अब जीने से ज्यादा दिखाने में विश्वास करने लगे हैं। हर छोटी-बड़ी घटना को कैमरे में कैद करना जरूरी हो गया है. चाहे वह निजी हो या संवेदनशील। यह प्रवृत्ति न केवल निजता को खत्म कर रही है, बल्कि संवेदनाओं को भी कमजोर बना रही है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जहां ‘बकवास’ एक उद्योग बन चुका है। इसमें समय भी लग रहा है, पैसा भी लग रहा है और सबसे बड़ी बात युवा पीढ़ी की ऊर्जा भी लग रही है। लेकिन इसके बदले में क्या मिल रहा है? कुछ लाइक्स, कुछ फॉलोअर्स और एक झूठी संतुष्टि, जो कुछ ही पलों में खत्म हो जाती है। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि समस्या है। जब तक हम इसे केवल मनोरंजन कहकर नजरअंदाज करते रहेंगे, तब तक इसका समाधान संभव नहीं है।
युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि हर ट्रेंड का हिस्सा बनना जरूरी नहीं है। हर रील बनाना जरूरी नहीं है। और सबसे महत्वपूर्ण—हर बकवास को देखना और शेयर करना जरूरी नहीं है। जरूरत है एक संतुलन की। तकनीक का उपयोग करें, लेकिन उसके गुलाम न बनें। रील बनाएं, लेकिन उसमें सार हो। व्लॉग करें, लेकिन उसमें सच्चाई हो। अगर हम इस माध्यम को सही दिशा में उपयोग करें, तो यह एक शक्तिशाली साधन बन सकता है। लेकिन अगर इसे यूं ही बकवास का माध्यम बनने दिया गया तो यह पीढ़ी को केवल शोर और खालीपन ही देगा।
अंत में, यह याद रखना जरूरी है कि भविष्य लाइक्स और व्यूज से नहीं बनता, बल्कि मेहनत, अनुशासन और सही दिशा से बनता है। अगर युवा पीढ़ी ने समय रहते इस अंतर को नहीं समझा, तो रील, व्लॉग और बकवास केवल एक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक संकट बन जाएगा। आज सवाल यह नहीं है कि कौन सा वीडियो वायरल हो रहा है, बल्कि यह है कि कौन सा विचार जीवित रह रहा है, क्योंकि यही विचार समाज को दिशा देते हैं।
(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद
