लखनऊ, 18 अप्रैल (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित रिजर्व पुलिस लाइन में शनिवार को “डीएनए एवं अन्य जैविक साक्ष्य संकलन” विषय पर एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया।

इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों को आधुनिक वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से साक्ष्य संकलन, संरक्षण एवं उनके प्रभावी उपयोग के प्रति प्रशिक्षित करना था, जिससे अपराधों की विवेचना अधिक सटीक, निष्पक्ष एवं परिणामोन्मुख बन सके।
इस प्रशिक्षण कार्यशाला का उद्देश्य पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से साक्ष्य संकलन एवं संरक्षण के प्रति जागरूक एवं दक्ष बनाना था, ताकि अपराधों की विवेचना अधिक सटीक, प्रभावी एवं न्यायसंगत ढंग से की जा सके। कार्यक्रम में कमिश्नरेट लखनऊ के विभिन्न थाना क्षेत्रों से नामित 107 प्रतिभागी सम्मिलित हुए। प्रशिक्षण सत्र विशेषज्ञों की ओर संचालित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों को व्यवहारिक एवं तकनीकी दोनों स्तरों पर विस्तृत जानकारी प्रदान की गई।
प्रशिक्षण सत्र में विशेषज्ञ प्रशिक्षक प्रगति सिंह वैज्ञानिक अधिकारी विधि विज्ञान प्रयोगशाला ने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण के दौरान बताया कि घटनास्थल से प्राप्त रक्त एवं अन्य जैविक साक्ष्यों को पहले हवा में अच्छी तरह सुखाकर ही कागज के लिफाफे में सुरक्षित रखा जाए, जिससे साक्ष्य की गुणवत्ता प्रभावित न हो। साथ ही यह भी निर्देशित किया गया कि ऐसे सभी नमूनों को 72 घंटे के भीतर विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) भेजा जाना अनिवार्य है, ताकि समय पर वैज्ञानिक परीक्षण सुनिश्चित हो सके। इसके अतिरिक्त, प्रतिभागियों को यह भी अवगत कराया गया कि एफएसएल से किस प्रकार की जानकारी अपेक्षित है, इस संबंध में स्पष्ट एवं सटीक प्रश्न तैयार किए जाएं तथा संबंधित अभिलेखों एवं दस्तावेजों का व्यवस्थित रूप से संधारण किया जाए।
उक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य पुलिस विवेचना को अधिक वैज्ञानिक, प्रभावी एवं सुदृढ़ बनाना है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की गुणवत्ता एवं विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।
प्रशिक्षण के दौरान डीएनए साक्ष्य के महत्व, घटनास्थल से जैविक साक्ष्यों के वैज्ञानिक तरीके से संकलन, उनकी उचित पैकेजिंग, सुरक्षित संरक्षण एवं प्रयोगशाला तक सुरक्षित प्रेषण की प्रक्रिया पर विस्तार से जानकारी दी गई। साथ ही यह भी अवगत कराया गया कि घटनास्थल पर की गई छोटी-छोटी लापरवाहियां महत्वपूर्ण साक्ष्यों को नष्ट कर सकती हैं, जिससे विवेचना प्रभावित होती है। सभी कार्मिकों को अत्यधिक सतर्कता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के निर्देश दिए गए। इसके अतिरिक्त प्रत्येक अधिकारी एवं कर्मचारी को घटनास्थल पर अत्यधिक सावधानी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया।
प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न केस स्टडी एवं व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि डीएनए एवं जैविक साक्ष्य जटिल अपराधों के अनावरण में किस प्रकार निर्णायक भूमिका निभाते हैं। प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए उन्हें आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों से भी अवगत कराया गया। इस अवसर पर यह भी निर्देशित किया गया कि प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान का उपयोग अपने-अपने थाना क्षेत्रों में प्रभावी रूप से किया जाए तथा अन्य कार्मिकों को भी इसके प्रति जागरूक किया जाए, जिससे समस्त पुलिस बल की कार्यक्षमता में वृद्धि हो सके।
कमिश्नरेट लखनऊ ने कहा कि अपराध नियंत्रण एवं विवेचना की गुणवत्ता को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम समय-समय पर आयोजित किए जाते रहेंगे। यह पहल पुलिसिंग को अधिक पारदर्शी, वैज्ञानिक एवं परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उक्त प्रशिक्षण कार्यशाला पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी तथा इससे न केवल अपराधों के सफल अनावरण में सहायता मिलेगी, बल्कि न्यायालय में अभियोजन की सफलता दर में भी उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। यह कार्यक्रम संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध एवं मुख्यालय) अपर्णा कुमार, संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून एवं व्यवस्था) बबलू कुमार, पुलिस उपायुक्त (मुख्यालय) अमित कुमावत के प्रभावी मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। कार्यशाला का संचालन सहायक पुलिस आयुक्त (महिला अपराध/ट्रेनिंग सेल) सौम्या पाण्डेय के पर्यवेक्षण में हुआ।
हिन्दुस्थान समाचार / दीपक
