कुलभूषण उपमन्यु

हिमाचल प्रदेश के 2025-26 के बजट का आकार 54,928 करोड़ रुपये है। इससे पहले 2024-25 के बजट का आकार 58,444 करोड़ रुपये और 25-26 के बजट का आकार 58,514 करोड़ रुपये था। जाहिर है कि राजस्व घाटा अनुदान केंद्र सरकार की ओर से बंद हो जाने के कारण महंगाई दर में बढ़ोतरी के बावजूद बजट आकार घटाना पड़ा है। इसका असर विकास योजनाओं पर पड़ना स्वाभाविक है। पेंशन, वेतन, ग्रेच्युटी, ब्याज, ऋण भुगतान, प्रतिबद्ध देनदारियों पर 73.69 प्रतिशत बजट खर्च हो रहा है। इसके चलते वास्तविक विकास कार्यों के लिए केवल 26.31 प्रतिशत भाग ही बचता है।
यह हिमाचल के बजट की स्थाई विसंगति बन चुकी है। यह इस वर्ष भी हावी है। इसके लिए काफी हद तक टॉप हेवी प्रशासन तंत्र का निर्माण बड़ी गलती रहा है, जिसके चलते अनुत्पादक खर्च अनावश्यक रूप से बढ़ गया है। इसके कारण जहां उत्पादक कार्य होना है वहां बजट ही देना संभव नहीं होता है। इसके बावजूद बहुत से जरूरी कार्यों की ओर ध्यान देने का प्रयास किया गया है, हालांकि पर्याप्त धन आवंटन संभव ही नहीं है। कृषि, बागवानी, पशु पालन, वानिकी, के लिए बेहतर पहल करने का प्रयास किया गया है किन्तु पर्याप्त धन आवंटन नहीं हो पाया है।
उदाहरण के लिए मानव- वन्य पशु संघर्ष के चलते कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव को रोकने के लिए जालीदार तारबाड़ की बड़े पैमाने पर जरूरत है ताकि सूअर, बंदर, नीलगाय और बेसहारा पशुओं से खेती को पहुंचाया जा रहा नुकसान रुक सके, जिसके चलते बहुत से किसान खेती छोड़ने पर बाध्य हो चुके हैं। खेत बाड़ बंदी योजना पर केवल 10 करोड़ रुपये ही आवंटित किए जा सके जो नाकाफी हैं। पशुपालन क्षेत्र में कई अच्छे फैसले हुए हैं। ए 2 किस्म के दूध को अलग पहचान देने का कार्य सराहनीय है जो भारतीय पशु धन में दूध की गुणवत्ता को मान्यता दे कर प्रोत्साहित करता है।
इसे प्रीमियम कीमत देना भी अच्छा फैसला है। दूध खरीद मूल्य भी किसान हितैषी फैसला है। डेरी उद्योग को पर्याप्त प्रोत्साहन अच्छी पहल है। किन्तु हिमाचल पशु चारे के मामले में पंजाब और हरियाणा के महंगे तूड़ी आयात पर निर्भर हो चुका है जबकि 30- 40 वर्ष पहले जब पशु संख्या आज के मुकाबले बहुत ज्यादा थी हर घर में 2-4 पशु होना मामूली बात थी। आज तो उससे आधे भी पशु नहीं बचे हैं फिर भी तूड़ी आयात करने की बाध्यता वनों से चारा आपूर्ति की क्षमता चीड़ रोपण, और खरपतवारों (लैंटाना, यूपितोरियम, पार्थेनियुम, नीला फुलनू आदि) के भयानक आक्रमण के कारण इस दौरान समाप्त हो जाने के कारण ही आ पड़ी है। हिमाचल प्रदेश में निजी भूमि तो केवल 10 प्रतिशत ही है। उसमें अन्न, सब्जी, फल, आदि उगाने के बाद बहुत कम चारा उगाने की संभावना बचती है।
अत: 67 फीसद वन्य भूमि वाले प्रदेश को वनों से चारा उपलब्ध करवाने की पुरानी क्षमता को हासिल करना होगा, किन्तु इसके लिए चरागाह विकास की कोई योजना आज तक सही तौर पर बनी ही नहीं है। इस बार भी हमने इसकी अनदेखी जारी रखी है। सस्ता चारा पशु पालन का आधार है। इससे पशुपालन लाभदायक बनेगा, तो बेसहारा पशुधन की समस्या भी नियंत्रित होगी। पॉवर टिलर को सब्सिडी देकर प्रोत्साहित किया गया है। इसके कारण बैल तो अब लगभग समाप्त ही हो गया है। सारे बैल तो सड़कों पर घूम रहे हैं। अत: लिंग निर्धारित गर्भाधान व्यवस्था पर जोर दिया जाना चाहिए। ताकि ज्यादा तर बछिया ही पैदा हों। इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई है।
वनीकरण के लिए 32 फीसद भूमि को वनों के अधीन लाने के लिए महिला मंडलों और स्वयं सहायता समूहों को जोड़ने की पहल स्वागत योग्य है, किन्तु इसके साथ वन अधिकार कानून के अंतर्गत बनाई गई ग्राम वन प्रबन्धन समितियों को, जहां-जहां ये बन गई हैं, प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ये समितियां कानूनी रूप से अधिक सक्षम भी हैं और अधिक स्थाई भी। वन प्रबन्धन के लिए स्थायित्व बहुत महत्वपूर्ण तत्व है। बागवानी के लिए शिवा परियोजना को चंबा तक विस्तार दिया जाना चाहिए था। चंबा आकांक्षी जिला होने के बावजूद कई पहलों में छूट जाता है।
मछली पर बजट दबाव के बावजूद रायल्टी घटाना अच्छी पहल है। मछली पालन के लिए अन्य सुविधाएं भी स्वागत योग्य हैं। टिकाऊ पर्यटन के लिए नीति और प्रशिक्षण दूर दृष्टि का परिचायक है। हिमाचल में आपदा मुक्त विकास की अवधारणा पर काम करने की अत्यंत आवश्यकता है। पिछले कई वर्षों से हर बरसात में अतिवृष्टि के चलते निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और पर्वत विशिष्ट समझ का अभाव दिख रहा है जिस कारण जन-धन की भारी हानि झेलनी पड़ रही है। इस मद पर कोई नीति सामने नहीं आई है। कुल मिला कर बजट सीमित संसाधनों में संतुलन का अच्छा प्रयास है।
(लेखक, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष और पर्यावरणविद् हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद
