-प्रदीप श्रीवास्तव
दिल्ली की जीवनरेखा मानी जाने वाली यमुना नदी को साफ़ करने के लिए बीते तीन दशकों में हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की संयुक्त कोशिशों, विदेशी सहायता और न्यायिक हस्तक्षेप के बावजूद यमुना की स्थिति आज भी चिंताजनक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारें अभी तक यमुना को साफ़ करने की मूलभूत रणनीति को ही नहीं समझ पाई हैं। नतीजा यह है कि यमुना, जो कभी दिल्ली की प्यास बुझाने वाली नदी थी, आज एक मरी हुई नदी बनती जा रही है। जबकि, बहुत छोटे स्तर पर एक एनजीओ द्वारा किया गया प्रयास रंग लाने लगा है। क्योर एनजीओ ने बहुत छोटे स्तर पर मलिन बस्तियों से निकलने वाले सीवेज को साफ करना शुरू कर दिया है, जो यमुना में जाकर मिलता है। विशेषज्ञों की मानें तो अगर इस मॉडल को दिल्ली की सभी मलिन बस्तियों में लागू कर दिया जाए, तो यमुना को साफ करने में काफी हद तक कामयाबी पाई जा सकती है।
दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या सीवेजः यमुना नदी की कुल लंबाई लगभग 1,376 किलोमीटर है लेकिन उसमें मिलने वाले कुल प्रदूषण का 70% हिस्सा केवल दिल्ली से आता है। दिल्ली के भीतर बहने वाला लगभग 22 किलोमीटर लंबा हिस्सा यमुना का सबसे ज़्यादा प्रदूषित भाग है।
दिल्ली जल बोर्ड और सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट (2023) के अनुसार, दिल्ली 720 मिलियन गैलन प्रतिदिन सीवेज उत्पन्न करती है। लेकिन इसके शोधन की क्षमता लगभग 597 मिलियन गैलन प्रतिदिन ही है। वास्तविकता यह है कि चालू स्थिति में सिर्फ़ 514 मिलियन गैलन प्रतिदिन सीवेज ट्रीट होता है। यानी लगभग 200 मिलियन गैलन प्रतिदिन से अधिक सीवेज बिना शुद्धिकरण के सीधे यमुना में चला जाता है। दिल्ली में कुल 35 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं, लेकिन इनमें से 50% अपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं।
दिल्ली अर्बन शेल्टर इंप्रूवमेंट बोर्ड के अनुसार, दिल्ली में 1,800 से अधिक अनधिकृत कॉलोनियाँ और लगभग 750 मलिन बस्तियाँ हैं, जिनसे निकलने वाला सीवेज केंद्रीकृत सीवर नेटवर्क से जुड़ा ही नहीं है। इसका मतलब है कि बड़ी योजनाएँ और एसटीपी लगाने के बावजूद, जब तक इन बस्तियों और कॉलोनियों को ध्यान में रखकर विकेंद्रीकृत समाधान नहीं अपनाया जाएगा, तब तक यमुना को साफ़ करना संभव नहीं है।
छोटे प्रयास, बड़ा असरः दिल्ली के वसंत विहार इलाके के शिवा कैंप में सेंटर फ़ॉर अरबन एंड रेज़िलिएंस एक्सिलेंस एनजीओ बहुत प्रभावी है। क्योरने यहाँ डिसेंट्रलाइज़्डवेस्टवाटर ट्रीटमेंट सिस्टम लगाया है। यह सिस्टम इंटरसेप्टिक टैंक और बायो-रेमेडिएशन तकनीक पर काम करता है।बस्ती से निकलने वाला सीवेज पहले इंटरसेप्टिक टैंक में जमा होता है, जहाँ भारी गाद और ठोस अपशिष्ट बैठ जाते हैं। इसके बाद यह पानी एक बायो-फिल्टर यूनिट से गुजरता है, जिसमें प्राकृतिक बैक्टीरिया, पौधे और बायो मीडिया गंदगी को तोड़कर साफ़ कर देते हैं। अंत में पानी इतना साफ़ हो जाता है कि उसका उपयोग सिंचाई, ग्राउंडवॉटर रिचार्ज या सामुदायिक उपयोग में किया जा सकता है।
इस मॉडल के फायदेः सीवेज को यमुना तक पहुँचने से पहले ही रोक दिया जाता है। महंगे एसटीपी और बड़े ड्रेनेज नेटवर्क पर निर्भरता कम होती है।स्थानीय स्तर पर रोज़गार और सामुदायिक भागीदारी बढ़ती है। बस्ती में स्वास्थ्य और स्वच्छता की स्थिति सुधरती है।
दिल्ली के वसंत विहार इलाका स्थित शिवा कैंप, एक छोटी मलिन बस्ती है, जहाँ करीब 105 घर और लगभग 735 लोग रहते हैं। यहां काम कर रहे एक एनजीओ क्योर ने एक इंटरसेप्टिक टैंक लगाया, जो बस्ती से निकलने वाले सीवेज को साफ़ करता है।
सिर्फ छह महीनों में इस मॉडल ने बस्ती की तस्वीर बदल दी। अब यहाँ मच्छर और गंदगी जनित बीमारियाँ कम हो गईं। लोगों का स्वास्थ्य बेहतर हुआ और आय में सुधार हुआ। अब बस्ती के लोग खुद मानते हैं कि बीमारी पर होने वाला खर्च कम हुआ है।
यहाँ के राजू प्रधान, जो अघोषित तौर पर इस बस्ती के कर्ताधर्ता हैं, कहते हैं कि यहाँ गंदगी इतनी होती थी कि पहले यहाँ कूड़े वाली गाड़ी नहीं आती थी, लेकिन बाद में जब यहाँ एनजीओ वालों ने सफ़ाई की अलख जगाई, तब यहाँ पर इतनी सफ़ाई हो गई कि अब कूड़े वालों को यहाँ आने में भी कोई दिक्कत नहीं होती है। वे कहते हैं कि यहाँ हर चीज में तीन माह में ही फ़र्क दिखने लगा।
वहीं, यहाँ के एक निवासी बृजमणि कहती हैं कि यहाँ गंदगी के कारण लोगों के सिर में दर्द की शिकायत रहती थी, जबकि कई लोग माइग्रेन और त्वचा से संबंधित बीमारियों से पीड़ित थे, लेकिन यहाँ सफ़ाई व्यवस्था ठीक होने के कारण सब अच्छा हो गया और अब परेशानियाँ भी काफी कम हो गई है।
जबकि, आरती कहती हैं कि पहले मच्छर और मक्खियों की भरमार रहती थी लेकिन अब सफ़ाई होने के यहाँ गंदगी बहुत कम हो गई है। टायलेट की भी व्यवस्था काफी अच्छी है।
मुस्कान कहती हैं कि अब रिश्तेदार भी यहाँ की सफ़ाई की तारीफ़ करते हैं। पहले रिश्तेदारों को बुलाने में शर्म महसूस होती थी, क्योंकि यहाँ काफी गंदगी रहती थी, लेकिन अब यहाँ पर कोई भी आ जाए, हमें कोई दिक्कत नहीं होती है।
असल में देखा जाए तो यमुना की सफाई काफी हद तक छोटे-छोटे प्रयासों में छिपी है। दिल्ली अर्बन शेल्टरइंप्रूवमेंट बोर्ड और डीडीए के अनुसार, दिल्ली में करीब 750 मलिन बस्तियाँ हैं, जिनमें 3.5 लाख परिवार और 30 लाख से अधिक लोग रहते हैं। यदि शिवा कैंप जैसा मॉडल हर बस्ती में लागू किया जाए तो यमुना में गिरने वाला अनट्रीटेड सीवेज कम हो सकता है। जल प्रदूषण में भारी गिरावट आ सकती है और यमुना को पुनर्जीवित करने का सपना साकार हो सकता है।
क्यों ज़रूरी है विकेंद्रीकृत मॉडलः दिल्ली की 750 मलिन बस्तियों में से अधिकांश केंद्रीकृत सीवर नेटवर्क से जुड़ ही नहीं सकतीं क्योंकि वे नदी किनारे, रेलवे लाइन और सरकारी भूमि पर बसी हैं। इन बस्तियों का सीवेज सीधे नालोंके ज़रिए यमुना में चला जाता है। अगर हर बस्ती में क्योर जैसा डिसेंट्रलाइज़्ड वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट सिस्टम लगाया जाए, तो प्रतिदिन लगभग 100–120 MGD सीवेज यमुना में जाने से रोका जा सकता है। यह बड़े प्रयासों की तुलना में सस्ता, तेज़ और स्थानीय समाधान है।
यमुना को बचाना केवल तकनीकी चुनौती नहीं बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और सामाजिक भागीदारी का मामला है। अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद सरकारी योजनाएँ नाकाम रहीं, जबकि एक छोटे से एनजीओ का प्रयोग दिखाता है कि बदलाव संभव है। अब सरकारों को चाहिए कि वह मलिन बस्तियों और अनधिकृत कॉलोनियों में विकेंद्रीकृत सीवेज ट्रीटमेंट मॉडल लागू करे। एनजीओ को शामिल करते हुए जनभागीदारी सुनिश्चित करे। सीवेज डेटा और ग्राउंड-लेवल मॉनिटरिंग को पारदर्शी बनाया जाए। यमुना खुद को पुनर्जीवित कर सकती है, बस ज़रूरत है ईमानदार प्रयास की और यह कोविड लॉकडाउन ने साबित कर दिया। अब ज़रूरत है कि हम प्रदूषण के स्रोतों को रोकें और छोटे-छोटे प्रयासों को बड़े पैमाने पर लागू करें।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश
