जयपुर, 18 जनवरी (हि.स.)। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डी.वाई. चंद्रचूड़ ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में कानून, न्यायिक प्रणाली, लोकतंत्र और जमानत व्यवस्था को लेकर खुले विचार साझा किए। उन्होंने अपनी पीढ़ी और जेन-जी के दृष्टिकोण में अंतर बताते हुए कहा कि समाज और परिवार की बदलती जरूरतों को समझना और अपनाना जरूरी है।
अपने भाषण संग्रह पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि यह कोई सख्त कानूनी किताब नहीं है, बल्कि उनके विभिन्न भाषणों और अनुभवों का संग्रह है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट, भारतीय सुप्रीम कोर्ट और दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल व कांट के विचार इस संग्रह में शामिल हैं। उन्होंने समलैंगिकता को अपराधमुक्त करने वाले ऐतिहासिक फैसले का उदाहरण देते हुए कहा कि संवेदनशील मामलों में न्यायाधीशों को सोच और संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेना पड़ता है।
उमर खालिद के मामले पर उन्होंने स्पष्ट किया कि अब वह नागरिक के रूप में बोल रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय कानून की आधारशिला ‘निर्दोषता की पूर्वधारणा’ है और हर आरोपी तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि ट्रायल में दोष सिद्ध न हो जाए। उन्होंने बेल न देने की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए बताया कि अगर आरोपी सीरियल अपराधी नहीं है और समाज के लिए खतरा नहीं है, तो बेल नियम होनी चाहिए।
पूर्व सीजेआई ने नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े मामलों में हिरासत की लंबी अवधि पर भी सवाल उठाया और कहा कि अगर ट्रायल उचित समय में पूरा नहीं होता, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्पीडी ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने जिला अदालतों में बेल न देने की प्रवृत्ति को चिंताजनक बताया और जजों पर पड़े नैतिक दबाव का उदाहरण दिया, जिससे अधिकांश मामलों का बोझ सुप्रीम कोर्ट पर बढ़ रहा है।
भ्रष्टाचार पर उन्होंने कहा कि जज भी समाज का हिस्सा हैं और समाज में भ्रष्टाचार मौजूद है। हालांकि जजों से उच्च नैतिक मानक की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने जोर दिया कि गलत फैसले को भ्रष्टाचार से जोड़ने की बजाय सिस्टम को मजबूत करना और प्रभावी जवाबदेही व्यवस्था स्थापित करना जरूरी है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजीव
