– प्रो. जसीम मोहम्मद
पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपालजी को सुनने का अवसर मिला। उन्होंने स्पष्ट रूप से इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंदू-मुसलमानों के बीच आपसी संवाद का मकसद मुसलमानों को आरएसएस के नज़रिए को मानने के लिए बाध्य करना नहीं है, बल्कि उनकी चिंताओं और कठिनाइयों को ईमानदारी से समझना है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारतीय समाज की संवाद परंपरा यह मानती है कि हर तर्क में कुछ सचाई होती है। आपस में सिर्फ़ एक-दूसरे पर आरोप लगाने या अलग-अलग पक्षों द्वारा सांप्रदायिक उन्माद की घटनाओं का उल्लेख करने से कुछ हासिल नहीं होता।
उन्होंने यह उल्लेख किया कि सांप्रदायिक तनाव की असली जड़ दूसरों को अलग-थलग करने में है, जबकि समावेशी स्वरूप में समाज को एकजुट करने की शक्ति है। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक घटनाएँ कारण नहीं बल्कि लक्षण हैं। हिंदुओं से भी शिकायतें हैं, उनमें भी कमियाँ है, जिन्हें ईमानदारी और पारदर्शिता से दूर किया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि असल में युवा पेशेवरों को कौन कट्टरपंथी बनाता है? उन्होंने चेतावनी दी कि चरमपंथी घटनाओं के बाद अक्सर निर्दोष मुसलमानों को गलत तरीके से निशाना बनाया जाता है- जैसे किराए आदि पर उन्हें घर देने से मना करना या पेशेवर जाँच। इनसे अविश्वास और गहरा होता है और अनसुलझी ऐतिहासिक शिकायतें फिर से उभर आती हैं। यह मानते हुए कि ज़्यादातर मुसलमान राष्ट्रवादी हैं, उन्होंने कहा कि कुछ लोग इस पहचान को खुले तौर पर ज़ाहिर करने में हिचकिचाते हैं।
इस अवसर पर कृष्णगोपाल जी ने जवाहरलाल नेहरू के सन् 1948 ई. में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने के आह्वान को याद किया। उन्होंने यह कहते हुए बात खत्म की कि इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता। संवाद में हिस्सा लेनेवाले सिर्फ़ उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं। सच्ची सद्भावना तभी पैदा होगी जब हिंदू और मुसलमान दोनों ईमानदारी और आपसी सद्भावना के साथ आगे आएँगे।
डॉ. कृष्ण गोपालजी का यह विचार स्वाभाविक रूप से हमें एकता के अर्थ के बारे में एक बड़े और ज़्यादा स्थायी सवाल की ओर ले जाता है। अगर संवाद का मकसद दूसरों को अलग-थलग करने को कम करना और शक की जगह समझ पैदा करना है, तो एकता को विश्वास की समानता या तौर-तरीकों की एकरूपता के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता। इसके बजाय, इसे अलग-अलग धर्मों, विचारों और जीवन जीने के तरीकों वाले लोगों की गरिमा और आपसी सम्मान के साथ एक साथ रहने की क्षमता के रूप में समझा जाना चाहिए।
एकता का मतलब ज़रूरी नहीं कि सभी के लिए एक जैसा साझा विचार/प्रार्थना/जीवनशैली हो बल्कि इसका मतलब है कि हर किसी को यह समझ हो कि जो लोग उनसे अलग सोचते हैं/काम करते हैं और रहते हैं, उनके साथ शांति और आपसी सम्मान से कैसे रहा जाए। इसका एक उदाहरण भारत जैसे देश का है, जहाँ कई अलग-अलग धर्म, संस्कृति, भाषाएँ और रीति-रिवाज साथ-साथ मौजूद हैं। हम भारतीयों के लिए समग्र रूप से एकता की भावना के माध्यम से अपने रिश्ते को मज़बूत करना महत्वपूर्ण है, जिससे देश में शांति बनी रहे। समाज में आपसी एकता की कमी से छोटे-मोटे मतभेद गंभीर चिंता या झगड़ों में बदल सकते हैं। इसके विपरीत, अगर लोगों के बीच आपसी एकता और समन्वय का मज़बूत रिश्ता हो, तो वे छोटे-बड़े मतभेदों को समझदारी और इज़्ज़त के साथ सुलझा पाएँगे।
भारत का इतिहास स्पष्ट रूप से दिखाता है कि सामाजिक विविधता कोई कमज़ोरी नहीं है। हज़ारों सालों से इस देश ने अलग-अलग धर्मों और विचारों का स्वागत किया है। हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और कई दूसरी परंपराएँ यहाँ फली-फूली हैं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी, खानेपीने, कपड़ों, भाषा और मूल्यों में एक-दूसरे को प्रभावित किया है। यह साझा सभ्यता और संस्कृति का सफर साबित करता है कि भारत में साथ रहना ज़बरदस्ती नहीं है; यह स्वाभाविक है।
एकता और आपसी सम्मान पर यह ज़ोर राष्ट्रीय नेतृत्व के सबसे ऊंचे स्तर पर भी दिखता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि भारत की वास्तविक शक्ति हर नागरिक को धर्म की पूरी आज़ादी देने में है। उन्होंने साफ कहा है कि हर व्यक्ति को बिना किसी ज़बरदस्ती या दबाव के अपनी पसंद का धर्म मानने, बनाए रखने या अपनाने का पूरा-पूरा अधिकार है। साथ ही, उन्होंने मज़बूती से कहा है कि किसी भी धार्मिक समूह को- चाहे वह बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक, खुलेआम या चुपके से नफ़रत फैलाने या सामाजिक सद्भाव को ज़हर देने का कोई अधिकार नहीं है। यह संतुलित तरीक़ा, जो धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है और नफ़रत और बंटवारे के खिलाफ एक साफ लाइन खींचता है, संवैधानिक मूल्यों और सभ्यता की नैतिकता में निहित शासन के दर्शन को दिखाता है। आस्था की स्वतंत्रता और सांप्रदायिक भड़कावे के लिए ज़ीरो टॉलरेंस दोनों पर ज़ोर देकर प्रधानमंत्री ने लगातार अंतर-धार्मिक सद्भाव को शांति, राष्ट्रीय एकता और भारत की लंबी अवधि की प्रगति के लिए एक ज़रूरी स्तंभ के रूप में बढ़ावा दिया है।
सामाजिक समरसता और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देने की इसी भावना के साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी भारत में अलग-अलग विभिन्न समुदायों के बीच एकता और सम्मान की आवश्यकता के विषय में बात की है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि सामाजिक सद्भाव भारत की एकता और अखंडता की नींव है। हमें विविधता को बाँटना नहीं चाहिए बल्कि अलग-अलग धर्मों और पृष्ठभूमि के लोगों के बीच आपसी संबंधों को और भी मज़बूत करना चाहिए। भागवत ने सभी समुदायों के लोगों से सद्भावना के साथ मिलकर रहने का आग्रह किया है, यह देखते हुए कि सामूहिक सद्भावना और समझ ने भारतीयों को अलग-अलग मान्यताओं और प्रथाओं के बावजूद शांति से एक साथ रहने में मदद की है।
यहाँ यह विचारणीय है कि सच्ची शांति का मतलब है कि लोग अपनी पहचान में सुरक्षित महसूस करें। इसका मतलब है कि माता-पिता को अपने बच्चों के लिए डर न हो, पड़ोसी एक-दूसरे पर भरोसा करें और सभी समुदाय स्वयं को सम्मानित महसूस करें। अंतर धार्मिक सद्भाव, शक को कम करके और उसकी जगह समझ पैदा करके सुरक्षा की यह भावना पैदा करता है। जब लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, तो डर धीरे-धीरे स्वत: समाप्त हो जाता है। लगातार तनाव के माहौल में उन्नति या प्रगति नहीं हो सकती। जब समुदाय बँटे होते हैं तो विकास के बजाय संघर्ष में ऊर्जा बर्बाद होती है।
एक आत्मविश्वासी धर्म बातचीत से खतरा महसूस नहीं करता।
ऐतिहासिक दस्तावेज़ एवं घटनाक्रम हमें दिखाते हैं कि सांप्रदायिक सद्भाव वाले सह-अस्तित्व को विभिन्न प्रयासों से बनाए रखना चाहिए, न कि इसे अपने आप बन जाने की अपेक्षा के लिए छोड़ देना चाहिए। अगर संबंधित सभी पक्षों के बीच आपसी रचनात्मक बातचीत का कोई भी अवसर उपलब्ध नहीं है, तो इसके कारण और अधिक गलतफहमियाँ पैदा होंगी। इसलिए, यह ज़रूरी है कि धार्मिक नेता, विद्वान और आम जनता एक-दूसरे के साथ नियमित बातचीत और संवाद करें; यह किसी भी गलतफहमी को बड़े बँटवारे या दरार में बदलने से रोकने में सहायता मिल सकती है।
एक शांतिपूर्ण और एकजुट समाज लोकतंत्र को मज़बूत करता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से ही नहीं बल्कि नागरिकों के बीच आपसी समझ और सम्मान से भी जीवित रहता है। जब लोगों को लगता है कि उनके धर्म और पहचान का सम्मान किया जाता है तो वे राष्ट्र के सामाजिक जीवन में ज़्यादा सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। इसलिए, अंतर धार्मिक सद्भाव लोकतांत्रिक स्थिरता और राष्ट्रीय अखंडता का समर्थन करता है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
हिन्दुस्थान समाचार / जितेन्द्र तिवारी
