


– महाभारत के युद्ध का मूल कारण बना सचेत अंधत्व
भोपाल, 18 जनवरी (हि.स.)। देश में पहली बार मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित हो रहे महाभारत समागम के तीसरे दिन रविवार की रात नृत्य नाटिका नेत्रपट, उरुभंगम्, मोहे पिया का मंचन हुआ। मैत्रेयी पहाड़ी के निर्देशन में हुई नृत्य नाटिका की प्रस्तुति में यह बताया गया कि महाभारत के युद्ध का मूल कारण सचेत अंधत्व बना।
वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित सभ्यताओं के संघर्ष एवं औदार्य की महागाथा पर केंद्रित महाभारत समागम के तीसरे दिन बहिरंग के मंच पर लोकछंदा, नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत नृत्य-नाटिका ‘नेत्रपट’ ने दर्शकों को विचार और संवेदना के स्तर पर गहराई से उद्वेलित किया। मैत्रेयी पहाड़ी के निर्देशन में यह प्रस्तुति केवल एक नृत्य-नाट्य नहीं, बल्कि महाभारत की दार्शनिक चेतना का समकालीन पुनर्पाठ बनकर सामने आई।
इसके पूर्व पूर्वरंग में पद्मश्री राजातेंदू रथ के निर्देशन में सराईकेला छाऊ शैली पर आधारित ‘उरुभंगम्’ तथा अंतरंग सभागार में वामन केन्द्रे निर्देशित ‘मोहे पिया’ का मंचन भी हुआ, जिसने इस दिन को कलात्मक और वैचारिक दृष्टि से समृद्ध बनाया। वीर भारत न्यास के परामर्शी राहुल रस्तोगी द्वारा मोमेंटो भेंट कर सभी कलाकारों का स्वागत अभिनंदन किया गया।
नेत्रपट : महाभारत का दार्शनिक पुनर्पाठ
‘नेत्रपट’ अंधत्व को आँखों की शारीरिक असमर्थता न मानकर मानव चेतना द्वारा चुनी गई अवस्था के रूप में प्रस्तुत करती है। यह नृत्य-नाटिका उस निर्णायक क्षण की पड़ताल करती है, जब मनुष्य सत्य को देखने में सक्षम होते हुए भी उससे दृष्टि फेर लेता है। प्रस्तुति में नेत्रपट दो अर्थों में उभरता है—एक ओर कृष्ण में पूर्ण शरणागति का प्रतीक, जहाँ बाह्य दृष्टि के बंद होने पर आंतरिक विवेक जागृत होता है; दूसरी ओर वही नेत्रपट अहंकार, हठ और जिद से जन्मे उस सचेत अंधत्व का रूप ले लेता है, जिसने महाभारत के युद्ध को अनिवार्य बना दिया।
नृत्य-नाटिका अपने शिखर पर तब पहुँचती है, जब कृष्ण का विराट रूप प्रकट होता है और साधारण दृष्टि असमर्थ हो जाती है। यहीं गीता उपदेश का बिंदु जन्म लेता है, जहाँ देखने का अर्थ बदल जाता है—दृष्टि नेत्रों से नहीं, विवेक से उत्पन्न होती है। ‘नेत्रपट’ अंततः यह उद्घोष करती है कि मुक्ति देखने में नहीं, बल्कि सही प्रकार से देखने में निहित है।
मोहे पिया में महाभारत का मानवीय और भावनात्मक पक्ष
अंतरंग सभागार में रंगपीठ थियेटर, मुंबई द्वारा प्रस्तुत संस्कृत आधारित मध्यम व्यायोग ‘मोहे पिया’ का मंचन निर्देशक वामन केंद्रे के निर्देशन में किया गया। यह नाटक महाकवि भास के ‘मध्यम व्यायोग’ पर आधारित है, जिसमें महाभारत के भीम, हिडिम्बा और घटोत्कच के प्रसंग को संवेदनशील मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत किया गया। कथा जंगल में घटित होती है, जहाँ बलिदान, कर्तव्य और करुणा के भाव उभरते हैं। भीम द्वारा स्वयं को बलिदान के लिए प्रस्तुत करना और हिडिम्बा द्वारा पहचान का क्षण नाटक को भावनात्मक ऊँचाई देता है। अंत में घटोत्कच का कुरुक्षेत्र में वीरगति प्राप्त करना त्याग और वीरता के मूल्यों को प्रभावशाली रूप से स्थापित करता है।
छाऊ नृत्य में ‘उरुभंगम्’
पद्मश्री राजातेंदू रथ के निर्देशन में राजातेन्दु कला निकेतन, सराईकेला द्वारा प्रस्तुत ‘उरुभंगम्’ का प्रभावशाली मंचन छाऊ नृत्य शैली में किया गया। महाकवि भास रचित इस नृत्य-नाटिका में कुरुक्षेत्र युद्ध के अंतिम दिन की घटनाओं को केंद्र में रखा गया। भीम–दुर्योधन गदा युद्ध, नियमभंग और पराजय के बाद दुर्योधन की पीड़ा को करुण भाव से प्रस्तुत किया गया। यहाँ दुर्योधन एक खलनायक नहीं, बल्कि आत्मचिंतनशील, क्षमाशील और संवेदनशील नायक के रूप में उभरता है। माता-पिता, पत्नियों और पुत्र से उसका भावनात्मक संवाद नाटक को गहन मानवीय आयाम प्रदान करता है।
फिल्म कुरूक्षेत्र एवं अतिथि से संवाद का प्रदर्शन
अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के दूसरे दिन रविवार को नाग अन्ना की फ़िल्म ‘कुरुक्षेत्र’ तथा अतिथि से संवाद का प्रदर्शन किया गया। फ़िल्म कुरूक्षेत्र में महाभारत के युद्ध, पात्रों की आंतरिक द्वंद्वात्मकता और सभ्यताओं के संघर्ष को भव्य दृश्यात्मक भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिसे दर्शकों ने सराहा।
सोमवार की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां
महाभारत समागम के सांस्कृतिक आयोजनों में पूर्वरंग में सोमवार को सायं 5 बजे मयूरभंज छाऊ नृत्य शैली में आदित्य प्रताप दास द्वारा निर्देशित कर्णवध का मंचन किया जायेगा। जबकि अंतरंग सभागार में रतन थियाम, थवाई थियाम निर्देशित नाट्य कनुप्रिया की प्रस्तुति होगी। भारत भवन के बहिरंग में 19 जनवरी को सायं 7:00 सभ्यताओं के संघर्ष एवं औदार्य पर एकाग्र विमर्श, दुनिया के चर्चित कवियों की कविताओं का पुनर्पाठ किया जायेगा। जिसमें डॉ. सीताराम दुबे, डॉ. शिवाकांत वाजपेयी, वसंत शिंदे, डॉ. राजेश शर्मा, संतोष चौबे, दीपाली पडवाडकर, राजेन्द्र गुप्त, जयंत देशमुख, विजय मनोहर तिवारी, मुकेश मिश्रा, शैलेन्द्र शर्मा आदि विद्वान उपस्थित रहेंगे। सत्र संयोजन ब्रजेश राजपूत एवं आनंद पांडे द्वारा किया जायेगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर
