– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल, 26 जनवरी (हि.स.)। मध्य प्रदेश की धरती पर जब भी पत्थरों की भाषा पढ़ी जाती है, शिलाओं पर उकेरे गए आदिम मनुष्य के सपने समझे जाते हैं और गुफाओं की दीवारों पर जब सांस लेते इतिहास को अनुभूत किया जाता है, तब अनायास ही एक नाम सामने आता है; भारत के महान पुरातत्त्वविद्, चित्रकार, इतिहासकार और सांस्कृतिक शोधकर्ता डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर का।
डॉ. नारायण व्यास उन्हीं के शिष्य हैं, इसलिए पुरातत्व के इस तपस्वी को जब 2026 में पद्मश्री सम्मान के चुना गया, तो यह सम्मान उन अनगिनत पत्थरों, शैलचित्रों और अनसुनी कथाओं का सम्मान था, जिन्हें उन्होंने जीवन भर सहेजा।
सच; आज के संदर्भ में देखें तो सच्चे अर्थों में ‘पत्थर के देवता’ हैं, क्योंकि उनके लिए पत्थर जड़ नहीं, जीवंत इतिहास हैं। मध्य प्रदेश की धरती पर फैली पहाड़ियां, गुफाएं और शैलाश्रय सिर्फ प्राकृतिक संरचनाएं नहीं हैं, वे मानव सभ्यता की सबसे पुरानी स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। इन पत्थरों की भाषा को जिसने पढ़ा, समझा और दुनिया को सुनाया, उनमें आज डॉ. नारायण व्यास का नाम अग्रणी है।
मालवांचल से जुड़े डॉ. नारायण व्यास का जीवन पुरातत्व और सांस्कृतिक संरक्षण की ऐसी प्रेरक कहानी है, जिसमें यश से अधिक कर्म और प्रचार से अधिक प्रतिबद्धता दिखाई देती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में सीनियर और बाद में सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट के रूप में उन्होंने 2009 तक सेवा की। यह वह समय था, जब पुरातत्व कार्य आसान नहीं था। सीमित संसाधन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और लंबी फील्ड यात्राएं इस पेशे का हिस्सा थीं। लेकिन डॉ. व्यास के लिए यह सब चुनौतियां एक नया अवसर दे रही थीं क्योंकि उनके लिए पुरातत्व नौकरी नहीं, जीवन-धर्म था।
डॉ. व्यास की पहचान का सबसे उज्ज्वल अध्याय भीमबेटका से जुड़ा है। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक मानव की जीवन-शैली, कला और सोच का सबसे प्रामाणिक साक्ष्य है। गुफाओं की दीवारों पर बने शैलचित्र हजारों वर्ष पुराने हैं, जिनमें शिकार, नृत्य, सामाजिक गतिविधियां और प्रकृति से मनुष्य का संबंध स्पष्ट दिखाई देता है। डॉ. व्यास ने अपने गुरु डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के सान्निध्य में भीमबेटका की रॉक पेंटिंग्स का गहन अध्ययन किया और उनके संरक्षण के लिए वर्षों तक काम किया।
डॉ. वाकणकर, जिन्हें भारतीय रॉक आर्ट का पितामह कहा जाता है से मिली दृष्टि और अनुशासन ने डॉ. व्यास को इस क्षेत्र का विशेषज्ञ बनाया। 2003 में जब भीमबेटका को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला, तब उसके पीछे डॉ. व्यास जैसे शोधकर्ताओं की वर्षों की मेहनत छिपी हुई दिखाई दी।
भीमबेटका के अलावा सांची स्तूपों के संरक्षण और अध्ययन में भी डॉ. व्यास की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। सांची केवल स्थापत्य का उदाहरण होने के साथ विश्व भर के लिए आज बौद्ध दर्शन, अहिंसा और शांति का प्रतीक है। इन स्तूपों और उनसे जुड़े बौद्ध स्थलों के वैज्ञानिक अध्ययन, दस्तावेजीकरण और संरक्षण में डॉ. व्यास ने उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सांची की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान अक्षुण्ण रहे और आने वाली पीढ़ियां इसे उसी गरिमा के साथ देख सकें।
डॉ. व्यास का शोध कार्य गुजरात स्थित रानी की वाव तक भी फैला। रानी की वाव पर उन्होंने अपना पीएचडी शोध पूरा किया। यह बावड़ी भारतीय जल-संरचना, स्थापत्य कला और धार्मिक प्रतीकों का अद्भुत उदाहरण है। रानी की वाव को 2014 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया और इसके वैश्विक स्तर पर स्थापित होने में डॉ. व्यास के शोध और संरक्षण प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन तीनों स्थलों भीमबेटका, सांची और रानी की वाव के संरक्षण में योगदान देना अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि है, जो बहुत कम पुरातत्वविदों के हिस्से आती है।
मध्य भारत में प्रागैतिहासिक औजारों और शैलचित्रों पर डॉ. व्यास का कार्य उन्हें विशेष स्थान दिलाता है। उन्होंने प्रारंभिक मानव द्वारा उपयोग किए गए 500 से अधिक प्रागैतिहासिक औजारों का संग्रह तैयार किया, जिसे उन्होंने शोध और शिक्षा के उद्देश्य से संरक्षित किया है। यह संग्रह असम बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज है और पुरातत्व जगत में इसे एक दुर्लभ उपलब्धि माना जाता है। यह संग्रह इस बात का भी प्रमाण है कि डॉ. व्यास के लिए पुरातत्व अध्ययन के साथ विरासत को सहेजने की जिम्मेदारी है।
शैक्षणिक दृष्टि से भी डॉ. व्यास का योगदान व्यापक है। उन्होंने मध्य भारत के रॉक आर्ट स्थलों पर पोस्ट-डॉक्टरेट डी.लिट. किया, जिससे उनकी विशेषज्ञता को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली। स्पेन जैसे देशों के साथ उनका सहयोग इस बात का संकेत है कि भारतीय रॉक आर्ट और प्रागैतिहासिक अध्ययन वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में दिए गए उनके व्याख्यानों से शोधार्थियों के साथ ही आम लोगों को भी इतिहास के प्रति संवेदनशील बनाया है।
डॉ. व्यास ने अपने गुरु डॉ. वाकणकर की स्मृतियों को संरक्षित करने के लिए दिल्ली में दीर्घा निर्माण में भी सहयोग किया है। यह कार्य उनकी उस सोच को दर्शाता है, जिसमें ज्ञान परंपरा और गुरु-शिष्य संबंध को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी कारण उन्हें पुरातत्व जगत में “मध्य भारत का पुरातत्व पुरोधा” और “ग्रैंड ओल्ड मैन” कहा जाता है। यह उपाधियां किसी औपचारिक घोषणा से नहीं, बल्कि सम्मान और अनुभव से मिलती हैं।
ऐसे में कहना यही होगा कि वर्ष 2026 में पद्मश्री सम्मान मिलना बताता है कि पुरातत्व अतीत की खुदाई और उसे जानने के अर्थ में तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही ये सांस्कृतिक चेतना और अपने जड़ों की पहचान की रक्षा का माध्यम भी है। आज भी एक लम्बी उम्र पार करने के बाद भी डॉ. नारायण व्यास उतने ही सक्रिय दिखाई देते हैं, जितने कि किसी शोधार्थी युवा को देखा जा सकता है।
वे शोध, लेखन, संवाद और मार्गदर्शन के माध्यम से युवा पीढ़ी को विरासत से जोड़ने का सतत कार्य कर रहे हैं। उनका काम इस बात का प्रमाण है कि पत्थर जड़ नहीं होते, वे बोलते हैं, अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं, वे हंसते और रोते भी हैं। इस तरह देखें तो उनमें समय की स्मृति, मानव और प्रकृति की तमाम कहानियां और सभ्यता की चेतना बसती है। डॉ. व्यास आज भी पत्थरों की भाषा को समझा रहे हैं। इसी अर्थ में वे वास्तव में “पत्थर के देवता” हैं, जिनकी साधना ने भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत और सभ्यता को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए उसे सुरक्षित किया है।
—————
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
