– साहित्य अकादेमी ने किया साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन
नई दिल्ली, 28 जनवरी (हि.स.)। साहित्य अकादेमी ने बुधवार को प्रख्यात कवि एवं कथाकार तथा साहित्य अकादेमी के सदस्य विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया।
श्रद्धांजलि सभा में साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक, साहित्य अकादेमी हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक गोविंद मिश्र तथा हिंदी परामर्श मंडल के अन्य सदस्यों रामदेव शुक्ल, सियाराम शर्मा, उर्मिला शिरीष, तुलसी रमण, महादेव टोप्पो, व्यासमणि त्रिपाठी, देवसिंह पोखरिया, ब्रजरतन जोशी, पुखराज जांगिड़ उपस्थित थे। अन्य सदस्य खेमसिंह डहरिया, दिनेश दधीचि, विकास दवे एवं प्रत्युष दवे सभा में ऑनलाइन भी उपस्थित रहे।
साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने 24 भारतीय भाषाओं के लेखकों की तरफ से अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि विनोद कुमार शुक्ल सही मायनों में बड़े रचनाकार थे। उन्होंने लीक से हटकर भाषा का ऐसा सर्जनात्मक फ्रेम बनाया, जिसमें सभी को अलग तरीके से प्रभावित किया। उनके लेखन की खिड़की हमेशा खुली रहेगी और सब तक उसका उजास हमेशा पहुंचता रहेगा।
रामदेव शुक्ल ने विनोद कुमार शुक्ल के लेखन को विशेष बताते हुए कहा कि उनका लेखन इतना विविध और श्रेष्ठ था कि पाठकों के अतिरिक्त फिल्मकारों को भी उसने अपनी तरफ खींचा।
तुलसी रमण ने उनकी हिमाचल यात्रा को याद करते हुए बताया कि उन्होंने उस यात्रा पर पांच कविताएं लिखी थीं। दिनेश दधीचि ने उनकी सादगी और ईमानदारी की चर्चा करते हुए उनकी अनूठी भाषा शैली को याद करते हुए उनके योगदान को अतुलनीय बताया। खेमसिंह डहेरिया और विकास दवे ने उनकी रचनाओं में जन सामान्य की उपस्थिति की चर्चा करते हुए उनको याद किया।
महादेव टोप्पो ने उनके ध्यान खीचने वाले शीर्षकों को याद करते हुए कहा कि वे अपने पड़ोसी के जीवन को देखने की क्षमता रखते थे इसी कारण उनकी कविताओं में आदिवासी जीवन भी भरपूर मात्रा में नजर आता है। उन्होंने लिखने की प्रेरणा दी।
सियाराम शर्मा ने उन्हें अप्रतिम गद्यकार के रूप में याद करते हुए कहा कि वे साधारण व्यक्ति के अभाव को भी बड़े ऐश्वर्य के साथ चित्रित करते थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ के परिवेश को बहुत गहनता से जाना-समझा और प्रस्तुत किया।
व्यासमणि त्रिपाठी ने उनकी चित्रमयी भाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि वे हिंदी साहित्य के साधक थे और हिंदी समाज उनका हमेशा ऋणी रहेगा। देवसिंह पोखरिया ने शुक्ल को युग प्रवर्तक बताया।
उर्मिला शिरीष ने उनके जीवन की सादगी को याद करते हुए कहा कि उनकी चुप्पी ही उनकी ताकत थी। उनके लेखन में निम्न मध्यवर्गीय परिवार ही नहीं, बल्कि स्थानीय जंगल-जमीन और पशु-पक्षी भी हैं। उन्होंने जैसा जिया, वैसा ही लिखा भी।
गोविंद मिश्र ने उनके कई संस्मरण साझा करते हुए कहा कि वे हमारे समय के ऐसे विशिष्ट रचनाकार थे जिन्होंने लाइम लाइट में आए बिना अपना उत्कृष्ट सृजन जारी रखा और अपने लेखन में अपनी जीवन शैली को भी ढाल लिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी
