‘तीर्थराज प्रयाग का पौराणिक महत्व : सृष्टि रचना से लेकर आधुनिक काल तक’ राष्ट्रीय संगोष्ठी
प्रयागराज, 28 जनवरी, (हि.स)। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हिन्दुस्तानी एकेडेमी के तत्वावधान में बुधवार को एकेडेमी सभागार में दो सत्रों में विषय ‘तीर्थराज प्रयाग का पौराणिक महत्व : सृष्टि रचना से लेकर आधुनिक काल तक’ राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने कहा कि ‘वेदों की स्थापना के बाद ब्रह्मा जी ने यहीं पहला यज्ञ किया, इसलिए प्रयाग नाम पड़ा। सृष्टि का सृजन करने से पहले भी ब्रह्मा जी ने अपना पहला यज्ञ यहीं किया था। ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से अन्य तीर्थों के साथ प्रयागराज तीर्थ की तुलना की और उसका महत्व आंका। जिसमें उन्होंने पाया कि अन्य तीर्थों के मुकाबले प्रयागराज तीर्थ अधिक भारी है। तब ब्रह्मा जी ने प्रयाग को ही सब तीर्थो का राजा बना दिया। उसी दिन से सब तीर्थ इनके अधीन रहने लगे और तीर्थराज प्रयाग कहने लगे।’
प्रो. विवेकानंद तिवारी, अध्यक्ष अम्बेडकर पीठ, हिमांचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला ने कहा कि ‘प्रयाग का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। यह तीर्थ बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्ध है और संगम के जल से प्राचीन काल में राजाओं का अभिषेक होता था। इस बात का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है। वन जाते समय श्रीराम प्रयाग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम पर होते हुए गए थे। सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक पुराण मत्स्य पुराण के 102 अध्याय से लेकर 107 अध्याय तक में इस तीर्थ के महात्म्य का वर्णन है। उसमें लिखा है कि प्रयाग प्रजापति का क्षेत्र है जहां गंगा और यमुना बहती हैं। माघ महीने में यहां सब तीर्थ आकर वास करते हैं। इसलिए इसे तीर्थराज भी कहते है।
संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. उदय प्रताप सिंह, पूर्व अध्यक्ष, हिन्दुस्तानी एकेडेमी ने कहा कि ‘पुराण भारतीय लोकजीवन की धड़कन है। विज्ञान के लाख विकास के बाद भी यहां का जनजीवन पुराणों में फैली धारणाओं से संचालित होता है। पुराणों में लिखा है कि यहां के कुंभ में स्नान करने से हजार अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है। जनता के मन में यह विश्वास अडिग है। संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि यह जानते हुए भी कि मरना निश्चित है, कोई भी इसके लिए तैयार नहीं है। अतः देवासुर संग्राम में जयंत द्वारा अमृत कलश लेकर भागना, उसकी कुछ बुंदों का प्रयाग की धरती पर गिरना और उसे प्राप्त कर अमर हो जाने वाला विश्वास ही यहां खींच लाता है। उज्जैन, हरिद्वार और नासिक के कुंभ भी इसी विश्वास से जुड़े हैं।
‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक डॉ. अनुपम परिहार ने कहा कि ’तीर्थराज प्रयाग केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं, संस्कृतियों और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत केंद्र है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम जिस प्रकार नदियों को एक करता है, उसी प्रकार प्रयाग भारतीय जीवन-दृष्टि को एक सूत्र में बांधता है।’
हेमवंती नन्दन बहुगुणा राजकीय डिग्री कॉलेज के प्रो. जयराम त्रिपाठी ने कहा कि ‘गंगा के उद्गम से प्रारम्भ शब्द प्रयाग-पंच प्रयाग को पूर्णता प्राप्त होती है। सम्राट हर्षवर्धन के प्रयाग आने और पावन अवसर पर अपना सर्वस्व दान करने का वर्णन इतिहास में है।’
महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय, सतना के प्रो. ललित कुमार सिंह ने कहा कि ‘कुंभ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या मेला नहीं है, भारतीय सभ्यता और संस्कृति का उदाहरण है। दुनिया की सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुई किंतु हमारे देश में सभ्यताओं के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विकास के केंद्र में हमारे पवित्र नदियां ही हैं।’
संचालन करते हुए डॉ. विनम्रसेन सिंह, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने कहा कि ‘तीर्थराज प्रयाग भारतीय संस्कृति का वह दिव्य केंद्र है, जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पावन संगम होता है। पुराणों में इसे सृष्टि का आदि-तीर्थ कहा गया है, जहां स्वयं ब्रह्मा ने प्रथम यज्ञ सम्पन्न किया। यह स्थान तप, त्याग और मोक्ष की साधना का प्रतीक माना गया है।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में मचांसीन अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान एकेडेमी के सचिव डॉ. अजीत कुमार सिंह ने किया। सत्र की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. अचला पाण्डेय, हिन्दी विभाग, बुन्देलखंड विश्वविद्यालय, झांसी ने कहा कि ऋग्वेद और यजुर्वेद में प्रयाग को तपोभूमि और यज्ञ भूमि कहा गया है। ब्रह्मा जी द्वारा प्रथम यज्ञ इसी पुण्य भूमि पर किया गया जिसके कारण इसका नाम प्रयाग हुआ। ब्रह्म पुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण,पद्म पुराण, रामायण, तथा महाभारत सभी ग्रंथों में प्रयागराज का उल्लेख है।’
दूसरे सत्र की वक्ता प्रो. सपना गुप्ता, अध्यक्ष भाषा एवं नवीनीकरण विभाग, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा ने कहा कि ‘भारतवर्ष की सांस्कृतिक चेतना तीर्थों के माध्यम से विकसित हुई है। इन तीर्थों में प्रयागराज का स्थान सर्वोपरि है। यह नगर सृष्टि काल से लेकर आधुनिक भारत तक आध्यात्मिक धार्मिक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से निरंतर महत्वपूर्ण रहा है।’ डॉ. रमाकांत राय, पंचायत राज राजकीय महिला पी.जी. कॉलेज, इटावा ने तीर्थराज प्रयाग में स्नान के महत्व पर प्रकाश डाला।
डॉ. राकेश कुमार सिंह, हिन्दी विभाग, सत्यवती महाविद्यालय, दिल्ली ने कहा कि सर्वविदित है कि तीर्थराज प्रयाग का महत्व प्राचीन काल से लेकर आज तक बना हुआ है। वस्तुतः प्रयागराज भारतीय सनातन संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। माँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर स्थित यह नगरी ‘सृष्टि के प्रथम यज्ञ’ से लेकर स्वाधीनता संग्राम और समसायिक चुनौतियों की साक्षी रहा है। अंत में धन्यवाद ज्ञापन एकेडेमी को कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने किया। इस अवसर पर शौरभ उपाध्याय शोध छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपना शोध पत्र का वाचन किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / विद्याकांत मिश्र
