
गोरखपुर, 29 जनवरी (हि.स.)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने जैव प्रौद्योगिकी विभाग में आयोजित “पेटेंट से प्रोडक्ट तक” प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस अवसर पर उन्होंने पेटेंट-फाइल्ड नवाचारों एवं उत्पाद विकास से संबंधित शोध कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय अनुसंधान को समाजोपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करने की दिशा में निरंतर अग्रसर है। इस प्रदर्शनी में तरल जैविक खाद (वर्मीवाश) बनाने की विधि विकसित की गई है जो अत्यंत किफायती है।

तरल जैविक खाद (वर्मीवाश) बनाने की विधि

रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति घट रही है तथा पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और उपयोगी सूक्ष्मजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में कम लागत में अधिक एवं सुरक्षित उपज के लिए जैविक खेती एक प्रभावी विकल्प है। वर्मीकम्पोस्टिंग द्वारा प्राप्त केंचुआ खाद और उससे निकला तरल जैविक खाद वर्मीवाश जैविक खेती का महत्वपूर्ण घटक है।
वर्मीवाश को विशेष कलेक्टिंग यंत्र द्वारा आसानी से फिल्टर कर निकाला जाता है। इसका प्रयोग फसलों पर छिड़काव के रूप में किया जाता है। 3–4 बार छिड़काव करने से फसलों की सघन वृद्धि, रोग प्रतिरोधक क्षमता और उत्पादन में वृद्धि होती है। वर्मीकम्पोस्ट एवं वर्मीवाश में नाइट्रोजन, पोटैशियम, कैल्शियम, खनिज लवण, एंजाइम, हार्मोन एवं विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
यह विधि कम खर्चीली, पर्यावरण-अनुकूल और छोटे किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी है। वर्मीकम्पोस्ट ₹10–15 प्रति किलोग्राम तथा वर्मीवाश ₹30–40 प्रति लीटर की दर से बाजार में उपलब्ध है। यह बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार का अच्छा साधन भी है। रासायनिक खादों पर निर्भरता कम कर वर्मीकम्पोस्टिंग एक नई हरित क्रांति का आधार बन सकती है।
इस पेटेंट को उत्पाद के रूप में विकसित कर व्यवहारिक उपयोग तक पहुँचाने का कार्य विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग के प्रो. केशव सिंह एवं निशात फ़ातिमा द्वारा किया गया है।
बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ
गोरखपुर विश्वविद्यालय ने पिछले दो वर्षों में बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। विश्वविद्यालय ने शोध नवाचारों के संरक्षण एवं प्रौद्योगिकी विकास पर विशेष ध्यान देते हुए 79 पेटेंट आवेदन दायर किए, जिनमें 60 प्रकाशित हो चुके हैं तथा 2 प्रकाशन हेतु तैयार हैं। साथ ही 65 कॉपीराइट आवेदन किए गए, जिनमें 22 पंजीकृत हो चुके हैं, तथा एक ट्रेडमार्क आवेदन भी किया गया है।
विश्वविद्यालय की सुव्यवस्थित IPR प्रणाली के माध्यम से नवाचारों की पहचान, मूल्यांकन एवं संरक्षण को प्रभावी रूप से सुनिश्चित किया जा रहा है। वर्तमान में 8–9 प्रमुख तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है तथा अन्य नवाचारों को पेटेंट हेतु प्रक्रिया में लिया गया है।
ये उपलब्धियाँ NIRF जैसी रैंकिंग प्रणालियों में Research एवं Innovation मानकों को सुदृढ़ करती हैं। कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि मजबूत IPR पारितंत्र शोध की गुणवत्ता और प्रभाव को बढ़ाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय
