नई दिल्ली, 29 जनवरी (हि.स.)। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने आज उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना को पत्र लिखकर दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय (डीओई) में शिक्षकों की वरिष्ठता एवं पदोन्नति व्यवस्था में कथित लैंगिक भेदभाव के मुद्दे पर ध्यान आकर्षित कराया है।

विजेंद्र गुप्ता ने अपने पत्र में उदिता ( यूनिफाइड डेवलपमेंट इनिशिएटिव ऑफ टीचर्स एंड एडमिनिस्ट्रेटर्स) द्वारा प्राप्त एक प्रतिवेदन को अग्रेषित किया है। यह मामला दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय में शिक्षकों की पदोन्नति प्रणाली से संबंधित है, जहां अब भी पुरुष एवं महिला शिक्षकों के लिए अलग-अलग वरिष्ठता सूचियां बनाई जा रही हैं।

पत्र में कहा गया है कि लैंगिक विभाजन के कारण, अनुभव और संख्या में आगे होने के बावजूद महिला शिक्षकों को वर्षों तक पदोन्नति के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जबकि पुरुष शिक्षकों को अपेक्षाकृत शीघ्र पदोन्नति मिल जाती है। परिणामस्वरूप अनेक महिला शिक्षक एक ही पद पर लंबे समय तक कार्यरत रहने के बाद बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो जाती हैं।
पत्र में इस बात का उल्लेख है कि मामला वर्तमान में उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है और विभाग द्वारा पूर्व में यह संकेत भी दिया गया था कि पुरुष एवं महिला शिक्षकों की अलग-अलग वरिष्ठता सूचियों को एकीकृत किया जाएगा, इसके बावजूद पदोन्नतियां अभी भी पुरानी लैंगिक-आधारित प्रणाली के अंतर्गत की जा रही हैं। इससे यह आरोप सामने आए हैं कि यह प्रक्रिया महिला शिक्षकों के साथ अन्यायपूर्ण भेदभाव करती है और सार्वजनिक सेवा में समान अवसर के सिद्धांत का उल्लंघन करती है।
विजेंद्र गुप्ता ने उपराज्यपाल से इस विषय में हस्तक्षेप करने तथा शिक्षा निदेशालय को लैंगिक भेदभाव समाप्त करने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने का आग्रह किया है। उन्होंने वरिष्ठता सूचियों के तत्काल एकीकरण तथा यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया है कि सभी पदोन्नतियां समानता, न्याय और संविधान की भावना के अनुरूप की जाएं।
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष ने यह भी स्मरण कराया कि उनके कार्यालय द्वारा पूर्व में संबंधित विभाग को सरकार के स्थायी अधिवक्ता एवं सभी हितधारकों से परामर्श कर इस विषय की पुनः समीक्षा करने तथा पुरुष-महिला के भेद के बिना वरिष्ठता सूचियों के एकीकरण की प्रक्रिया आरंभ करने की सलाह दी गई थी। इसके बावजूद पुरानी प्रणाली के अंतर्गत जारी पदोन्नतियां लैंगिक असंतुलन और प्रशासनिक अन्याय को और गहरा करने का जोखिम पैदा कर रही हैं।
संवैधानिक समानता की भावना पर जोर देते हुए यह विषय सार्वजनिक रोजगार में लैंगिक समानता, समान अवसर और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की व्यापक आवश्यकता को रेखांकित करता है। भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है और लिंग के आधार पर किया गया कोई भी भेदभाव इन मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
पदोन्नति की प्रक्रिया पारदर्शी, एकरूप और केवल योग्यता व वरिष्ठता पर आधारित होनी चाहिए, न कि ऐसे कृत्रिम विभाजनों पर जो किसी विशेष वर्ग को नुकसान पहुंचाते हों। एक निष्पक्ष और विधिसम्मत व्यवस्था न केवल संस्थागत गरिमा को सुदृढ़ करती है, बल्कि विशेष रूप से उन महिला कर्मचारियों के विश्वास को भी मजबूत करती है, जिन्होंने लंबे समय से प्रणालीगत बाधाओं का सामना किया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव
