डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत एक बहुधर्मी, बहुसांस्कृतिक और विविधताओं से भरा राष्ट्र है। यहाँ विभिन्न धर्मों, परंपराओं और सामाजिक व्यवस्थाओं के कारण व्यक्तिगत जीवन से जुड़े कई कानून अलग-अलग रूप में लागू होते रहे हैं। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना और परिवार से जुड़े अन्य मामलों में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और अन्य समुदायों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ प्रचलित हैं। किंतु एक आधुनिक लोकतांत्रिक और संवैधानिक राष्ट्र के रूप में यह प्रश्न लंबे समय से उठता रहा है कि क्या एक ही देश में नागरिकों के लिए अलग-अलग नागरिक कानून उचित हैं? इसी संदर्भ में समान नागरिक संहिता का विचार समय-समय पर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आता रहा है।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय की एक टिप्पणी ने इस बहस को फिर से नई गति दे दी है। न्यायालय ने कहा है कि देश में समान नागरिक संहिता लागू करने पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है, हालांकि यह निर्णय न्यायपालिका का नहीं बल्कि संसद का विषय है। अदालत शरियत कानून 1937 की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मुस्लिम महिलाओं के साथ कथित भेदभाव का प्रश्न उठाया गया है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि इन प्रावधानों को हटाया जाता है तो कानून में एक प्रकार का खालीपन उत्पन्न हो सकता है और इसका स्थायी समाधान समान नागरिक संहिता के माध्यम से ही संभव है।
वस्तुत: समान नागरिक संहिता का प्रश्न एक कानूनी व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, यह संविधान में निहित समानता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए यह विषय केवल अदालतों या सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, राजनीति और संवैधानिक आदर्शों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती भी है।
संविधान में निहित विचार
समान नागरिक संहिता का विचार भारतीय संविधान में प्रारंभ से ही मौजूद है। संविधान के अनुच्छेद 44 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्य पूरे देश में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। यह प्रावधान राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के अंतर्गत रखा गया है, जिनका उद्देश्य सरकार को सामाजिक सुधार की दिशा में मार्गदर्शन देना है।
संविधान सभा में इस विषय पर व्यापक चर्चा हुई थी। संविधान निर्माता भीमराव रामजी आंबेडकर का मानना था कि आधुनिक राष्ट्र में नागरिकों के अधिकार धर्म के आधार पर अलग-अलग नहीं होने चाहिए। हालांकि उस समय देश की सामाजिक परिस्थितियों और विभिन्न समुदायों की आशंकाओं को देखते हुए इसे तत्काल लागू करने के बजाय नीति निदेशक सिद्धांतों में रखा गया। यह व्यवस्था इस उद्देश्य से की गई थी कि समय के साथ सामाजिक सहमति बनने पर इसे लागू किया जा सके।
पर्सनल लॉ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में अलग-अलग पर्सनल लॉ की व्यवस्था औपनिवेशिक काल की देन मानी जाती है। ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न धार्मिक समुदायों की परंपराओं को ध्यान में रखते हुए विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में अलग-अलग कानून लागू किए गए थे। स्वतंत्रता के बाद भी यह व्यवस्था जारी रही, हालांकि समय-समय पर इसमें सुधार किए गए। आज भी हिंदुओं के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और अन्य संबंधित कानून प्रभावी हैं, जबकि मुसलमानों के निजी मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 लागू होता है। इसी प्रकार ईसाई और पारसी समुदायों के लिए भी अलग-अलग कानून मौजूद हैं।
यह विविधता भारत की सामाजिक संरचना का हिस्सा अवश्य है, लेकिन कई बार यह व्यवस्था संविधान में प्रदत्त समानता और न्याय के सिद्धांतों से टकराती हुई भी दिखाई देती है। विशेषकर महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में यह प्रश्न अधिक गंभीर हो जाता है।
न्यायपालिका का दृष्टिकोण
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया है। कई महत्वपूर्ण मामलों में अदालतों ने यह टिप्पणी की है कि अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण नागरिकों के बीच असमानता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। न्यायालयों का यह भी मत रहा है कि जब व्यक्तिगत कानूनों के कारण महिलाओं के अधिकार प्रभावित होते हैं तो संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को चुनौती मिलती है। हालिया सुनवाई में भी सर्वोच्च न्यायालय ने यही संकेत दिया कि यदि पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधानों को हटाया जाता है तो उसके स्थान पर एक व्यापक और समान नागरिक कानून की आवश्यकता होगी।
महिला अधिकारों के संदर्भ में महत्व
समान नागरिक संहिता की चर्चा अक्सर महिलाओं के अधिकारों के संदर्भ में अधिक होती है। भारत में कई पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार पुरुषों की तुलना में सीमित रहे हैं। कुछ समुदायों में बहुविवाह की अनुमति, तलाक की असमान प्रक्रिया और विरासत में कम हिस्सा जैसे मुद्दे लंबे समय तक विवाद का कारण बने रहे हैं। इन परिस्थितियों में महिलाओं को न्याय पाने के लिए अदालतों का सहारा लेना पड़ता है। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य इन असमानताओं को समाप्त कर एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करना है जिसमें सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हों और कानून धर्म के बजाय नागरिकता के आधार पर लागू हो।
राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता
भारत एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है। पंथनिरपेक्षता का अर्थ यह है कि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखे। यदि नागरिक कानून धर्म के आधार पर अलग-अलग होंगे तो यह सिद्धांत व्यवहार में कमजोर पड़ सकता है। समान नागरिक संहिता का उद्देश्य धार्मिक परंपराओं को समाप्त करना नहीं है, बल्कि नागरिक अधिकारों को धर्म से अलग करना है। विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषय मूलतः नागरिक अधिकारों से जुड़े होते हैं, इसलिए इन पर समान कानून होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप माना जाता है।
उत्तराखंड में प्रारंभिक प्रयोग
भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम उत्तराखंड में उठाया गया है। राज्य सरकार ने इसे लागू कर विवाह के अनिवार्य पंजीकरण, संपत्ति में बेटा-बेटी को समान अधिकार और विवाह व तलाक से जुड़े समान नियमों की व्यवस्था की है। इसे देश में एक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह व्यवस्था सफल होती है तो भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकती है।
राजनीतिक और सामाजिक विमर्श
समान नागरिक संहिता पर बहस नई नहीं है। संविधान सभा से लेकर आज तक यह विषय समय-समय पर चर्चा में आता रहा है। कई लोग इसे सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक कदम मानते हैं, जबकि कुछ समुदायों को आशंका है कि इससे उनकी धार्मिक परंपराओं पर प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए यह विषय केवल कानून बनाने का प्रश्न नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक संवाद और विश्वास निर्माण की भी आवश्यकता है।
कुल मिलाकर कहना यही है कि सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि इस विषय पर गंभीरता से विचार करने का समय आ चुका है, किंतु अंतिम निर्णय संसद को ही करना होगा। यदि समान नागरिक संहिता को संविधान की भावना, सामाजिक सहमति और सभी समुदायों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए लागू किया जाता है तो यह अधिक न्यायपूर्ण, आधुनिक और समावेशी भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
—————
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
