एवैस्कुलर नेक्रोसिस के उपचार में तकनीक प्रभावी

वाराणसी,12 मार्च (हि.स.)। चिकित्सा विज्ञान संस्थान काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ऑर्थोपेडिक्स विभाग में एवैस्कुलर नेक्रोसिस से पीड़ित एक युवा मरीज के लिए वेस्कुलराइज्ड फिबुलर ग्राफ्टिंग तकनीक जीवनदायिनी बन गई। इस नई तकनीक से सफलतापूर्वक जटिल शल्य उपचार के बाद बिहार निवासी महिला मरीज और उनके परिजन बेहद खुश है।
सर्जरी में प्रोफेसर डॉ. शिवम सिन्हा (ऑर्थोपेडिक्स) के निर्देशन में डॉ. सुदीप्तो बेरा (एसोसिएट प्रोफेसर, प्लास्टिक सर्जरी), डॉ. रोहित राय (असिस्टेंट प्रोफेसर, प्लास्टिक सर्जरी), डॉ. दिग्विजयसिंह सिंधव (सीनियर रेजिडेंट, प्लास्टिक सर्जरी) और डॉ. राहुल राय (सीनियर रेजिडेंट, ऑर्थोपेडिक्स) शामिल रहे। इस दौरान एनेस्थीसिया विभाग की पूरी टीम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रो.डॉ शिवम सिन्हा के अनुसार यह सर्जरी गुड़िया (18) निवासी बक्सर, बिहार की गई, जो ऑर्थोपेडिक्स वार्ड में भर्ती थी। मरीज पिछले दो वर्षों से कूल्हे की हड्डी के एवैस्कुलर नेक्रोसिस से पीड़ित थी। दो वर्ष पूर्व हुए ट्रॉमा और उसके बाद की गई फिक्सेशन सर्जरी के बाद उसे लगातार कूल्हे में दर्द और चलने में कठिनाई हो रही थी। मरीज की कम आयु को देखते हुए टोटल हिप रिप्लेसमेंट को उचित विकल्प नहीं माना गया, क्योंकि भविष्य में बार-बार सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है। इसलिए विशेषज्ञों की टीम ने वेस्कुलराइज्ड फिबुलर ग्राफ्टिंग जैसी उन्नत पुनर्निर्माण तकनीक का चयन किया, जिसका उद्देश्य प्राकृतिक कूल्हे के जोड़ को संरक्षित करना और उसमें पुनः रक्त आपूर्ति स्थापित करना है।
उन्होंने बताया कि एवैस्कुलर नेक्रोसिस तब होता है जब कूल्हे की हड्डी की रक्त आपूर्ति बाधित हो जाती है, जिससे हड्डी को रक्तहीनता क्षति होती है और धीरे-धीरे कूल्हे का जोड़ नष्ट होने लगता है। यह समस्या अक्सर कूल्हे के आसपास होने वाले फ्रैक्चर (इंट्रा-आर्टिकुलर फ्रैक्चर), अत्यधिक शराब सेवन, स्टेरॉयड दवाओं या अन्य कारणों से भी उत्पन्न हो सकती है। लगभग छह घंटे तक चली इस जटिल सर्जरी के दौरान प्लास्टिक सर्जरी टीम ने फिबुला हड्डी के एक हिस्से को उसकी रक्त वाहिकाओं सहित सावधानीपूर्वक निकाला। इसके बाद ऑर्थोपेडिक सर्जनों द्वारा इस वेस्कुलराइज्ड फिबुला ग्राफ्ट को फेमोरल हेड में प्रत्यारोपित किया गया।
माइक्रोवैस्कुलर तकनीक द्वारा रक्त वाहिकाओं का एनास्टोमोसिस किया गया, जिससे प्रत्यारोपित हड्डी में रक्त संचार बहाल हो सके और जैविक रूप से हड्डी का पुनर्निर्माण एवं स्थिरता प्राप्त हो सके। सर्जरी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई और वर्तमान में मरीज स्थिर है तथा वॉकर की सहायता से चलने लगी है। मरीज की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है और उसे चिकित्सकों की निगरानी में रखा गया है।———–
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी
