-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

आज के वैश्विक परिदृश्य में आत्मनिर्भरता किसी भी राष्ट्र की रणनीतिक स्वायत्तता, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति की स्वतंत्रता का आधार बन चुका है। विशेष रूप से भारत जैसे विकास की गति में तेज दौड़ते राष्ट्र के लिए आत्मनिर्भरता का प्रश्न उत्पादन बढ़ाने या आयात कम करने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है, बाहरी निर्भरताओं को कम करना और बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के बीच अपने राष्ट्रीय हितों का संतुलित प्रबंधन करना।
भारत के तेल आयात को लेकर समय-समय पर सामने आने वाले अंतरराष्ट्रीय दबाव इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं कि आर्थिक संसाधन और ऊर्जा आपूर्ति कैसे वैश्विक राजनीति में कूटनीतिक हथियार के रूप में भी प्रयुक्त हो सकते हैं! जब तेल की आपूर्ति को द्विपक्षीय व्यापारिक शर्तों से जोड़ा जाता है या किसी देश पर प्रतिबंध लगाकर उसके ऊर्जा व्यापार को सीमित किया जाता है, तब यह आर्थिक निर्णय नहीं रहता, बल्कि वह राष्ट्रों की विदेश नीति और रणनीतिक निर्णयों को भी प्रभावित करता है।
एक तरह से देखें तो भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है। ऐसी परिस्थितियाँ यह याद दिलाती हैं कि आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ सिर्फ घरेलू उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा है, यह बाहरी निर्भरताओं से उत्पन्न दबावों को समझकर उनका विवेकपूर्ण प्रबंधन करना भी है।
स्वतंत्र भारत की विकास यात्रा को देखें तो स्पष्ट होता है कि देश ने अपनी आर्थिक और राजनीतिक प्रगति की शुरुआत कई महत्वपूर्ण बाहरी निर्भरताओं के साथ की थी। इनमें चार क्षेत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे हैं; भोजन, विदेशी मुद्रा, रक्षा उपकरण और ऊर्जा। इन चारों क्षेत्रों में समय-समय पर उत्पन्न संकटों ने भारत के नीति-निर्माताओं को यह एहसास कराया कि यदि किसी राष्ट्र को अपनी नीति-निर्माण की स्वतंत्रता बनाए रखनी है, तब उस स्थिति में उसे इन मूलभूत क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमता विकसित करनी ही होगी।
इस संदर्भ में कहना होगा कि 1957-58 का विदेशी मुद्रा संकट स्वतंत्र भारत के लिए पहला बड़ा आर्थिक झटका था। उस समय आयात बढ़ने और निर्यात अपेक्षाकृत कम होने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट गया। परिणामस्वरूप भारत को आयात पर नियंत्रण लगाने और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की सहायता लेने के लिए विवश होना पड़ा। इस संकट ने नीति-निर्माताओं को यह समझा दिया कि यदि किसी देश की आर्थिक संरचना बाहरी संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर हो, तब वह आर्थिक दबावों के सामने कमजोर पड़ सकती है।
इसके कुछ वर्षों बाद 1962 में चीन के साथ युद्ध ने भारत की रक्षा व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कमजोरी को उजागर किया। उस समय यह स्पष्ट हो गया कि भारत रक्षा उपकरणों और सैन्य तकनीक के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी देशों पर निर्भर था। इस अनुभव ने देश को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि रक्षा उत्पादन में ‘स्वदेशी क्षमता’ का विकास राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।
इसी प्रकार 1965-67 के भीषण सूखे ने भारत की खाद्य सुरक्षा को संकट में डाल दिया। उस समय देश को अपनी जनता की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर खाद्यान्न आयात करना पड़ा। यह स्थिति भारत के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण थी, क्योंकि किसी भी देश के लिए ‘भोजन’ जैसी मूलभूत आवश्यकता में बाहरी निर्भरता उसकी संप्रभुता को कमजोर कर सकती है। यही वह दौर था जब भारत ने कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधारों और वैज्ञानिक तकनीकों के उपयोग के माध्यम से हरित क्रांति की दिशा में कदम बढ़ाया, जिसने अंततः देश को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया।
ऊर्जा क्षेत्र में भी इसी प्रकार की चुनौतियाँ सामने आईं। 1990 के खाड़ी युद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि हुई। चूँकि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा तेल आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए इस मूल्य वृद्धि का सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। परिणामस्वरूप भुगतान संतुलन का गंभीर संकट उत्पन्न हुआ और भारत को आर्थिक सुधारों की दिशा में बड़े कदम उठाने पड़े। इस अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया कि ऊर्जा जैसे रणनीतिक संसाधनों में बाहरी निर्भरता किसी भी राष्ट्र की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।
यहां समझने के लिए यह भी है कि भारतीय चिंतन में ‘स्वदेशी’ और ‘आत्मनिर्भरता’ का विचार शुरू से ही रहता आया है। प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में भी संसाधनों की स्वतंत्रता को राज्य की शक्ति का आधार माना गया है। ‘अर्थशास्त्र’ में महान राष्ट्रभक्त आचार्य ‘कौटिल्य’ ने राज्य की समृद्धि और सुरक्षा को उसके आर्थिक संसाधनों और उत्पादन क्षमता से जोड़ा है। उनके अनुसार,किसी भी राज्य की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने संसाधनों का प्रबंधन किस प्रकार करता है और बाहरी शक्तियों के प्रभाव से स्वयं को कितना सुरक्षित रख पाता है।
आधुनिक भारत में इस विचार को सबसे प्रभावी रूप से लाला लाजपत राय, विपिनचंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, पं. मदनमोहन मालवीय, माखनलाल चतुर्वेदी समेत महात्मा गांधी ने प्रस्तुत किया। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ में गांधी ने स्वदेशी की अवधारणा को आर्थिक नीति से कहीं अधिक सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। उनके शब्दों में, “स्वदेशी का अर्थ है अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने आस-पास उपलब्ध संसाधनों और श्रम का उपयोग करना।” गांधी के लिए स्वदेशी का उद्देश्य विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित न रहते हुए एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण था जिसमें समाज की आर्थिक संरचना बाहरी शक्तियों के नियंत्रण से मुक्त हो सके।
इसी प्रकार दादाभाई नौरोजी ने अपनी प्रसिद्ध कृति “पावर्टी ऐंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया” में यह तर्क दिया था कि ‘भारत की गरीबी का एक प्रमुख कारण उपनिवेशवादी शासन के कारण उत्पन्न आर्थिक निर्भरता थी।‘ उनके अनुसार ‘जब किसी देश के संसाधनों और व्यापारिक गतिविधियों पर बाहरी शक्तियों का नियंत्रण हो जाता है, तब उस देश की आर्थिक प्रगति बाधित हो जाती है।’ निश्चित तौर पर कहना होगा कि यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में भी आर्थिक निर्भरता कई बार राजनीतिक दबाव का माध्यम बन जाती है। इसे आगे हम देखते भी हैं कि पं. दीनदयाल उपाध्याय, दत्तोपंत ठेंगड़ी, नानाजी देशमुख जैसे विचारकों ने बहुत व्यवहारिक तरीके से भारतीय समाज के सामने रखा है।
वस्तुत: वर्तमान समय में भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का अधिकांश भाग तेल आयात के माध्यम से पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब ऊर्जा व्यापार को कूटनीतिक दबाव के साधन के रूप में प्रयोग किया गया। कुछ अवसरों पर अमेरिका ने अपने प्रतिबंधों के माध्यम से ईरान जैसे देशों से तेल आयात करने वाले देशों पर दबाव बनाया, जिससे भारत को भी अपने ऊर्जा आयात के निर्णयों में सावधानी बरतनी पड़ी। ऐसी परिस्थितियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि ऊर्जा निर्भरता सिर्फ आर्थिक विषय तक सीमित नहीं है, यह विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ है, इसीलिए आज आत्मनिर्भरता का अर्थ है, स्वदेशी क्षमता का विकास करते हुए बाहरी निर्भरताओं को इस प्रकार संतुलित करना कि कोई भी शक्ति भारत की नीति-निर्माण की स्वतंत्रता को प्रभावित न कर सके।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपनी पुस्तक “भारत 2020” में लिखा है कि ‘यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है तो उसे ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और रक्षा जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होना होगा।’ उनके अनुसार- ‘ऊर्जा आत्मनिर्भरता के बिना किसी भी राष्ट्र की दीर्घकालिक विकास रणनीति अधूरी रहती है।’ यही कारण है कि आज भारत नवीकरणीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, जैव-ईंधन और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे क्षेत्रों में तेजी से निवेश कर रहा है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत की विकास यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण सबक देती है, वह यह है कि आर्थिक संसाधनों में स्वदेशी क्षमता और बाहरी निर्भरताओं का संतुलित प्रबंधन ही वास्तविक आत्मनिर्भरता का आधार है। भोजन, विदेशी मुद्रा, रक्षा उपकरण और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में आए ऐतिहासिक संकटों ने यह सिद्ध किया है कि यदि कोई राष्ट्र अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए अत्यधिक बाहरी शक्तियों पर निर्भर रहता है तब उस स्थिति में उसकी नीति-निर्माण की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।
अत: वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में आत्मनिर्भरता का अर्थ है; स्वदेशी उत्पादन, तकनीकी नवाचार और बहुपक्षीय कूटनीति के माध्यम से ऐसी आर्थिक और रणनीतिक क्षमता का निर्माण करना, जिससे भारत वैश्विक शक्ति-प्रतिस्पर्धा के बीच भी अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके। यही वह मार्ग है जो भारत को उसे विश्व राजनीति में एक स्वतंत्र और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित करता हुआ दिखता है, अच्छा है कि वर्तमान केंद्र की मोदी सरकार इसी रास्ते पर चल रही है। वस्तुत: इसी में भारत का दीर्घकालीन हित निहित है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
