– विवेक कुमार पाठक

भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में कुछ संस्थाएँ ऐसी हैं जिनकी भूमिका विचार, संस्कार और समाज निर्माण की दीर्घ परंपरा तक व्याप्त है। ऐसा ही एक संगठन है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसकी स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में विजयादशमी के दिन की थी। सौ वर्षों की इस यात्रा को दृश्य माध्यम में समेटने का प्रयास करती फिल्म “शतक” एक विचार-यात्रा है। यह फिल्म उस संगठन की कहानी कहती है जो सामाजिक समरसता, राष्ट्रभाव और सेवा के संस्कारों को केंद्र में रखकर कार्य करता रहा है।
फिल्म का मूल स्वर संघ की उस मौन साधना को समझाने का है जिसे अक्सर सामान्य जन सतही तौर पर जानते हैं। संघ का दैनिक जीवन, शाखाओं में गूंजने वाला प्रार्थना गीत, भगवा ध्वज को गुरु मानने की परंपरा और स्वयंसेवकों के सेवा कार्य इन सबको फिल्म एक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करती है। विशेष रूप से यह दिखाया गया है कि कैसे संगठन समाज को जोड़ने, सांस्कृतिक चेतना जगाने और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना विकसित करने का प्रयास करता रहा है।
फिल्म की शुरुआत उस ऐतिहासिक दौर से होती है जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। उस समय की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों ने युवा डॉक्टर हेडगेवार को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे उन्होंने समाज में बिखराव, आत्मविश्वास की कमी और सांस्कृतिक अस्मिता के संकट को महसूस किया। यही अनुभव आगे चलकर संघ की स्थापना के प्रेरक बने। “शतक” में हेडगेवार के जीवन को बाल्यकाल से लेकर उनके प्रौढ़ चिंतन तक विस्तार से दिखाया गया है, उनकी राष्ट्रभक्ति, संगठन क्षमता और समाज के लिए उनकी दूरदर्शी सोच फिल्म का प्रमुख आकर्षण है।
फिल्म यह भी बताती है कि प्रारंभिक वर्षों में संघ को व्यापक स्वीकृति तुरंत नहीं मिली। कई स्थानों पर उपहास, विरोध और संदेह का सामना करना पड़ा। यहाँ पर स्वामी विवेकानंद का वह विचार स्मरण होता है कि किसी भी बड़े विचार को पहले उपहास, फिर विरोध और अंततः स्वीकार्यता मिलती है। “शतक” इसी क्रम को ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से सामने लाती है। धीरे-धीरे संघ की शाखाएँ बढ़ती हैं और संगठन सेवा, अनुशासन और सामाजिक समरसता के माध्यम से समाज में अपनी पहचान स्थापित करता है।
फिल्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वतंत्रता आंदोलन के दौर को लेकर है। इस समय विभिन्न विचारधाराओं और संगठनों की सक्रियता थी। फिल्म में यह संकेत मिलता है कि उस काल में कांग्रेस के भीतर भी अलग-अलग धाराएँ थीं और अनेक क्रांतिकारी विचार समानांतर रूप से सक्रिय थे। इस संदर्भ में सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और विनायक दामोदर सावरकर जैसे नायकों का उल्लेख उस दौर की वैचारिक विविधता को दर्शाता है।
“शतक” का दूसरा महत्वपूर्ण अध्याय संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) के नेतृत्व से जुड़ा है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे हेडगेवार के बाद उन्होंने संगठन को आगे बढ़ाया और कठिन परिस्थितियों में भी उसे स्थिर रखा। भारत विभाजन के समय उत्पन्न सामाजिक तनाव, “डायरेक्ट एक्शन डे” की हिंसक घटनाएँ और शरणार्थियों की पीड़ा इन सबके बीच स्वयंसेवकों के कार्यों को फिल्म में प्रमुखता से दिखाया गया है।
इसके साथ ही गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध और उसके परिणामों का चित्रण भी फिल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उस समय संघ को राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ा। “शतक” इस कालखंड को केवल घटनाओं के रूप में नहीं बल्कि एक परीक्षा-काल के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसमें संगठन ने अपने अस्तित्व और उद्देश्य दोनों की रक्षा करने का प्रयास किया।
फिल्म में उस दौर के राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ वैचारिक संवादों का भी उल्लेख है जिनमें महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। इन प्रसंगों के माध्यम से फिल्म उस समय की राजनीतिक जटिलताओं और निर्णयों पर विचार करने का अवसर देती है। निर्देशक का उद्देश्य यहाँ किसी निष्कर्ष को थोपना नहीं बल्कि दर्शकों को इतिहास के विभिन्न पक्षों को देखने और समझने के लिए प्रेरित करना प्रतीत होता है।
सिनेमा के दृष्टिकोण से देखें तो “शतक” की सबसे बड़ी ताकत इसका नैरेटिव टोन है। फिल्म में प्रसिद्ध अभिनेता अजय देवगन की आवाज़ में दिया गया वॉयसओवर पूरे कथानक को गंभीरता और प्रभाव देता है। उनकी आवाज इतिहास की घटनाओं को केवल जानकारी नहीं रहने देती बल्कि उन्हें भावनात्मक अनुभव में बदल देती है।
संगीत भी फिल्म की आत्मा को मजबूत करता है। गायक सुखविंदर सिंह की आवाज़ में गाया गया गीत “भगवा है अपनी पहचान” फिल्म का भावनात्मक चरम बनकर सामने आता है। इस गीत के माध्यम से फिल्म संघ के सांस्कृतिक प्रतीक भगवा ध्वज को गौरव और पहचान के रूप में प्रस्तुत करती है। कई सिनेमाघरों में यह गीत दर्शकों के भीतर विशेष भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। हालाँकि यह भी उल्लेखनीय है कि “शतक” संघ की सौ वर्ष की यात्रा को पूरी तरह समेटने का दावा नहीं करती। फिल्म मुख्यतः हेडगेवार और गोलवलकर के कालखंड पर केंद्रित है और संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस तक की कहानी का संकेत देती है। इस तरह यह फिल्म सौ वर्षों की यात्रा का “अर्धशतक” दिखाती है और संकेत देती है कि आगे का इतिहास भविष्य में किसी अगले भाग में सामने आ सकता है।
फिल्म का एक महत्वपूर्ण गुण यह है कि यह दर्शकों को विचार करने के लिए प्रेरित करती है। चाहे संघ के समर्थक हों या आलोचक दोनों के लिए यह फिल्म इतिहास के एक पक्ष को समझने का अवसर प्रदान करती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक निर्णयों की आलोचना और इतिहास की व्याख्या जैसे विषयों को फिल्म अप्रत्यक्ष रूप से उठाती है। यह दर्शक से अपेक्षा करती है कि वह तथ्यों को देखे, उन्हें तौले और फिर अपना निष्कर्ष स्वयं बनाए।
एक तरह से देखें तो “शतक” एक वैचारिक फिल्म है, जिसका उद्देश्य मनोरंजन से अधिक विचार और इतिहास को प्रस्तुत करना है। इसकी गति कहीं-कहीं धीमी लग सकती है, किंतु इसका महत्व एक दस्तावेजी महत्व के रूप में है। समग्र रूप से “शतक” आधुनिक भारत के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय की सिनेमाई प्रस्तुति है। यह फिल्म उन लोगों के लिए विशेष रूप से रोचक है जो संघ के इतिहास, उसकी विचारधारा और उसके कार्यों को समझना चाहते हैं। संघ के समर्थकों के लिए यह प्रेरणा का स्रोत हो सकती है, जबकि आलोचकों के लिए यह संवाद और विचार का अवसर प्रदान करती है।
अंततः कहा जा सकता है कि “शतक” एक ऐसी फिल्म है जो इतिहास, विचार और भावनाओं के संगम से बनी है। यह संघ के उन मौन तपस्वियों की कहानी कहती है जिन्होंने संगठन के माध्यम से समाज निर्माण का स्वप्न देखा। दर्शक इस फिल्म के साथ संवाद भी कर सकते हैं और शायद यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।
(लेखक स्वतंत्र स्तम्भकार हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
