कानपुर, 14 मार्च (हि.स.)। भगवान ऋषभदेव के व्यक्तित्व और कृतित्व का व्यापक प्रसार होना चाहिए, ताकि समाज उनके जीवन मूल्यों और शिक्षाओं को अपनाकर आत्मिक उन्नति और सांस्कृतिक समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ सके। उनके विचार आज भी मानव जीवन को संयम, अनुशासन और सदाचार का मार्ग दिखाते हैं। यह बातें शनिवार को प्रो. अनुपम जैन ने कहीं।

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर स्थित आचार्य विद्यासागर सुधासागर जैन शोध पीठ तथा दीनदयाल शोध केन्द्र के तत्वावधान में “तीर्थंकर ऋषभदेव: उनका सामाजिक-सांस्कृतिक अवदान” विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का दूसरा दिन विद्वानों के नाम रहा। कार्यक्रम का आरम्भ प्रो. अनुपम जैन (इंदौर) की अध्यक्षता तथा प्रो. अशोक कुमार जैन (रुड़की) और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मुख्य वक्ता डॉ. नीरज दाहाल के मुख्य आतिथ्य में हुआ। सत्र का संचालन शोध पीठ के निदेशक प्रो. अशोक कुमार जैन के संयोजन में किया गया।
इस अवसर पर अमेरिका से अभय जैन ने तीर्थंकर ऋषभदेव के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोध आलेख प्रस्तुत करते हुए कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है और उन्हें अंक विद्या तथा अक्षर विद्या का प्रवर्तक माना जाता है। कोल्हापुर से गोम्मटेश्वर पाटिल ने मराठी जैन साहित्य की रूपरेखा प्रस्तुत की, जबकि साध्वी चैत्यगुणा ने आहार संयम पर शोधपरक विचार रखे।
रुड़की से प्रो. अशोक कुमार जैन ने शोधार्थियों को इतिहास से जुड़े विषयों पर गंभीरता से अध्ययन करने की प्रेरणा दी। लखनऊ से शैलेन्द्र जैन ने जैन पुरातत्व के संदर्भ में सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक काल तक जैन प्रतिमाओं के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत की। उदयपुर के डॉ. सुमत कुमार ने भारतीय ज्ञान परंपरा में तीर्थंकर ऋषभदेव की भूमिका पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी के अन्य सत्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के डॉ. नीरज दाहाल ने ऋषभदेव के दर्शन में नारी सशक्तिकरण की अवधारणा पर विचार रखे। लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रो. भुवनेश्वरी भारद्वाज ने जैन और शैव दर्शन के संदर्भ में तुलनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में लगभग 40 शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। अंत में प्रो. अशोक कुमार जैन ने आभार व्यक्त किया।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप
