भोपाल, 17 मार्च (हि.स.)। हिंदू पंचांग के अनुसार 18 मार्च यानी कि बुधवार को ‘दर्श अमावस्या’ का पावन संयोग बन रहा है। यह दिन पितरों की शांति, तर्पण और दान-पुण्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पंडित एवं ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन किए गए धार्मिक कार्यों का कई गुना फल प्राप्त होता है और पितरों का आशीर्वाद जीवन में सुख-समृद्धि लेकर आता है।

उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्म में प्रत्येक अमावस्या आ अपना महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध और जल अर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। इस संबंध में आचार्य बृजेशचंद्र दुबे ने बताया कि “दर्श अमावस्या पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर है। इस दिन विधिपूर्वक तर्पण करने से पितृ दोष दूर होता है और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
अमावस्या के दिन दान-पुण्य, स्नान और जप-तप करने से कई जन्मों के पापों का क्षय होता है। विशेष रूप से जल, अन्न और वस्त्र का दान अत्यंत फलदायी माना गया है।” वहीं पंडित राजेश चौबे का कहना है, “जो लोग नियमित रूप से पितरों का तर्पण नहीं कर पाते, उनके लिए दर्श अमावस्या एक श्रेष्ठ अवसर होता है। इस दिन की गई पूजा से पितर प्रसन्न होकर वंशजों को सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं।”
दूसरी ओर इस संबंध में पंडित भरत शास्त्री का कहना है कि 18 मार्च को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:52 से 5:40 तक रहेगा, जोकि साधना और ध्यान के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। विजय मुहूर्त दोपहर 2:30 से 3:18 तक रहेगा, वहीं गोधूलि मुहूर्त शाम 6:29 से 6:53 तक है। अमृत काल रात 9:37 से 11:10 तक और निशीथ मुहूर्त रात 12:05 से 12:53 तक रहेगा। हालांकि इस दिन अभिजीत मुहूर्त नहीं है। राहुकाल दोपहर 12:29 से 2:00 बजे तक रहेगा। यमगंड सुबह 7:58 से 9:28 तक और गुलिक काल 10:59 से 12:29 तक प्रभावी रहेगा। इसके अलावा दुर्मुहूर्त दोपहर 12:05 से 12:53 तक रहेगा। बुधवार होने के कारण पंचक का प्रभाव पूरे दिन बना रहेगा।
उन्होंने बताया कि सूर्योदय सुबह छह बजकर 28 मिनट पर और सूर्यास्त शाम छह बजकर 31 मिनट पर होगा। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि सुबह आठ बजकर 25 मिनट तक रहेगी, इसके बाद अमावस्या तिथि प्रारंभ होगी। पूर्व भाद्रपद नक्षत्र सुबह पांच बजकर 21 मिनट तक रहेगा, जिसके बाद उत्तर भाद्रपद नक्षत्र प्रभावी होगा। शुभ योग सुबह चार बजकर एक मिनट से शुरू होकर 19 मार्च तक रहेगा। अत: धार्मिक दृष्टि से यह दिन आत्मशुद्धि, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और जीवन में संतुलन स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है। श्रद्धा और नियम के साथ किए गए कर्म पितरों को शांति देते हैं, जिसके परिणाम से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
