डॉ. प्रभात ओझा

विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला अमेरिका इसके अलावा भी कई कारणों से पहचाना जाता है। दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद से सुदृढ़ होती उसकी आर्थिक व्यवस्था ने उसे अत्यधिक मजबूत बनाया। अपने प्राकृतिक संसाधनों के बूते उसने विश्व बाजार में दावेदारी पक्की कर ली। आज अमेरिकी डॉलर के दबदबे और सैन्य शक्ति के प्रभाव में उसका जवाब नहीं। कमोबेश यही स्थिति इजराइल की है, जो अपनी कुशल आधुनिक सेनाओं और खुफिया एजेंसी मोशाद के लिए प्रसिद्ध है। किसी भी आपात स्थिति से मुकाबले के लिए यहां आम नागरिकों के लिए भी सैन्य प्रशिक्षण इस देश को विशेष बनाता है। दुनिया की ऐसी दो बड़ी ताकतें एक साथ मिलकर लंबे समय से कई तरह के प्रतिबंध झेल रहे ईरान पर हमला करें, तो सहज परिणाम की कल्पना की जा रही थी। युद्ध के खिंचते चले जाने से यह धारणा टूटने लगी कि सोवियत संघ के बिखराव के बाद विश्व अमेरिका के पीछे एकध्रुवीय हो गया है। ईरान के साथ युद्ध के 14 वें-15वें दिन अमेरिका ने खुद दुनिया के देशों से एक अपील कर इस धारणा को खत्म कर दिया कि वह किसी से भी अकेले लड़ने में सक्षम है।
राष्ट्रपति ट्रंप की इस अपील में अमेरिका की लाचारी झलकने लगी कि साथी देश होर्मुज जलडमरू क्षेत्र को खुला, सुरक्षित और स्वतंत्र बनाने में सहयोग करें। ईरान के साथ इजराइल और अमेरिका के संघर्ष के चलते इस क्षेत्र से तेल और गैस आपूर्ति रुक गई। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर ट्रंप ने इस तरह की अपील ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया सहित चीन से भी कर डाली। यह अपील ऐसे समय आई, जब कहा जा रहा था कि ईरान के पीछे चीन भी कई तरीकों से खड़ा है। अमेरिका की बौखलाहट को उसकी ओर से ईरान के खार्ग द्वीप पर किए हमले से समझा जा सकता है। ईरान के तेल का करीब 90 फीसद यहीं से निर्यात होता है। ईरान ने दावा किया कि अमेरिका हमले में तेल के बुनियादी ढांचे पर फर्क नहीं पड़ा। देखने की बात है कि इस हमले का वैश्विक तेल बाजार पर कितना असर होगा। भले तेल के बुनियादी ढांचे पर फर्क न पड़े, पर सैन्य तनाव तेल आपूर्ति में बाधक ही होगा।
दो हफ्ते से भी अधिक समय तक ईरान भी अमेरिकी और इजराइली हमलों का माकूल जवाब देता हुआ लगा। उन खाड़ी देशों में भी हमले हुए जहां अमेरिका ने अपने सैन्य अड्डे बना रखे हैं। कतर, कुवैत, सऊदी अरब, यूएई और बहरीन में मिसाइल, ड्रोन या इंटरसेप्शन के मामले दिखे। इन देशों ने सुरक्षात्मक स्थिति बनाए रखना सही समझा। समय के साथ उनका अमेरिका पर भरोसा खत्म हो जाए तो इसमें आश्चर्य नहीं।
अपनी दुर्गति देख अमेरिका ईरान से वापसी का फैसला कर ले, तो यह आश्चर्य की बात नहीं होगी। वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को पकड़कर अमेरिका ले आना लोगों को याद है। इस ताजा घटना के बाद मानवाधिकारों के उल्लंघन, हत्याओं के दोषी और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे मामलों में निकोलस पर अमेरिका में ही मुकदमा चल रहा है। उनकी पत्नी पर मादुरो को सहयोग करने के आरोप हैं। दोनों को किस तरह की सजा मिल सकती है, इस पर वर्ल्ड मीडिया को कोई शक नहीं है। यह जरूर है कि अमेरिका अब भारत सहित कई देशों को वेनेजुएला से तेल खरीदवाने की नीति पर काम कर रहा है। रूस से तेल लेने की कथित छूट की उसने समय सीमा तय करने का दावा किया।
अब ईरान पर हमले में इजराइल के साथ उतरने का अमेरिकी मकसद भी आर्थिक अधिक है। हालांकि उसे वेनेजुएला जैसी सफलता नहीं मिल सकी है। दुनिया में अमेरिका के कुछ प्रमुख सैन्य अभियान पहले भी असफल हो चुके हैं अथवा उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं। इराक का मामला लोगों के जेहन से शायद उतर गया हो। वर्ष 2003 में इराक में उसके दखल से बाथ पार्टी की सरकार जरूर गिर गई। तीन साल के अंतराल पर 2006 में बगदाद के उत्तरी उपनगर काजिमैन के इराकी-अमेरिकी संयुक्त सैन्य अड्डे ‘कैंप जस्टिस’ में सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी गई थी। इसके बावजूद सब कुछ अमेरिका के अनुकूल नहीं रहा। साल 2011 में वापसी के बाद 2014 में उसे फिर से इराक में दखल देना पड़ा था।
ऐसी प्रमुख घटनाओं में इसके पहले 1975 में वियतनाम युद्ध के बीच अमेरिका को अपनी सेनाएं वापस बुलानी पड़ी थी, तो अफगानिस्तान में तो लगभग दो दशक तक काबिज रही अमेरिकी सेनाएं 2021 में वापस आने को मजबूर हुईं। इन प्रमुख देशों के अतिरिक्त अन्य कई जगह अमेरिकी सेना उतारी गई, पर सामान्य तौर पर इस कवायद में मनोनुकूल सफलता नहीं मिली। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि अमेरिका इस धारणा को तोड़ना चाहेगा। इसलिए वह अपनी सेनाओं को सीधे ईरान की धरती पर नहीं उतारना चाहता। कुछ और दिनों तक ईरान के सुदृढ़ आर्थिक ठिकानों को वह निशाने पर रखेगा। सुप्रीम लीडर को मारने के बावजूद अमेरिका के हाथ पूरी सफलता नहीं लगी। फिर ईरान की आर्थिक कमर तोड़ने और परमाणु क्षमता समाप्त करने का दावा करते हुए उसके अपना मकसद पूरा होने की घोषणा करने की उम्मीद जरूर बंधी। आखिर व्हाइट हाउस के एआई और क्रिप्टो प्रमुख डेविड ने भी तो यही सलाह दी। डेविड का कहना था कि यह अमेरिका के लिए अच्छा मौका है, जब वह अपनी जीत बताते हुए ईरान से निकल आए।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद
