कानपुर, 02 अप्रैल (हि.स.)। मोबाइल और इंटरनेट का अनियंत्रित उपयोग युवाओं की एकाग्रता, मानसिक संतुलन और उत्पादकता के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है, इसलिए डिजिटल अनुशासन बेहद जरूरी है।” यह बातें गुरुवार को छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में आयोजित ‘फाइटिंग डिजिटल एडिक्शन’ कार्यक्रम में जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहीं।

जिलाधिकारी ने कहा कि बीसवीं शताब्दी में आईक्यू, फिर इक्कीसवीं सदी में ईक्यू महत्वपूर्ण रहा, लेकिन अब डिजिटल युग में डीक्यू तेजी से प्रमुख मानक बन रहा है। उन्होंने कहा कि आज की ‘अटेंशन इकॉनमी’ में बड़ी टेक कंपनियां लोगों का ध्यान बनाए रखने के लिए मनोविज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं, जिसमें मोबाइल फोन सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है।
उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया और मोबाइल एप्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि उपयोगकर्ता बार-बार फोन चेक करें। इसमें ‘इंटरमिटेंट रिइन्फोर्समेंट’ का सिद्धांत काम करता है, जिससे मस्तिष्क में डोपामिन रिलीज होता है और व्यक्ति स्क्रीन की ओर आकर्षित होता रहता है। उन्होंने 1954 के एक वैज्ञानिक प्रयोग का उदाहरण देते हुए बताया कि डोपामिन के प्रभाव में जीव बार-बार उसी क्रिया को दोहराता है, और यही सिद्धांत आज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लागू हो रहा है।
जिलाधिकारी ने कहा कि तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं, बल्कि डिजिटल अनुशासन विकसित करना जरूरी है। उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा के सफल अभ्यर्थियों और बैडमिंटन खिलाड़ी पी.वी. सिंधु का उदाहरण देते हुए बताया कि सफलता के लिए सीमित और नियंत्रित डिजिटल उपयोग अहम है।
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सृजन श्रीवास्तव ने कहा कि डिजिटल लत मनोवैज्ञानिक समस्या भी है, जिससे निपटने के लिए जागरूकता, आत्मनियंत्रण और परिवार व शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि इस दिशा में तीन स्तरीय हस्तक्षेप मॉडल लागू किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में 20 से 40 प्रतिशत युवा इंटरनेट एडिक्शन के जोखिम में हैं, जबकि कॉलेज छात्रों में यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच सकता है।
हिन्दुस्थान समाचार / रोहित कश्यप
