-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल, 03 अप्रैल (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष समाज जीवन में व्यापक परिवर्तन की एक सशक्त यात्रा बनकर उभरा है। मध्य प्रदेश जो संघ की दृष्टि से मध्य भारत, मालवा और महाकौशल, इन तीन प्रांतों में विभाजित है, वहां बीते एक वर्ष में सेवा, संगठन और समाज जागरण के जो आयाम सामने आए हैं, वे एक समन्वित सामाजिक परिवर्तन की स्पष्ट तस्वीर खींचते हैं। तीनों प्रांतों के आंकड़ों और गतिविधियों को समेकित रूप में देखें तो यह स्पष्ट होता है कि संघ का कार्य अब शाखाओं तक सीमित नहीं रहा, वह समाज के प्रत्येक वर्ग और क्षेत्र तक पहुंच चुका है।
मध्य भारत प्रांत के संघचालक अशोक पाण्डेय कहते हैं, “स्वयंसेवक नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर सक्रिय हैं। आज स्वयंसेवक हर क्षेत्र में सेवा कार्य करते हुए दिख जाएंगे, संघ की स्थापना ही डॉ. हेडगेवार जी ने इसलिए की थी कि हम अपने राष्ट्र को परम वैभव के उच्चशिखर पर ले जा सकें, इसलिए प्रार्थना में भी प्रत्येक स्वयंसेवक इस संकल्प को दोहराता है।”
पाण्डेय का कहना है, “राष्ट्रहित में समाज की सज्जन शक्ति की सक्रियता तथा सामाजिक समरसता के संकल्प के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्थापना काल के पहले दिन से ही कार्य कर रहा है और आगे भी इसी उद्देश्य को लेकर कार्य करता रहेगा।”
संगठन विस्तार : गांव-गांव तक पहुंचता संघकार्य
दरअसल, मध्य प्रदेश में संघ के संगठनात्मक विस्तार की गति उल्लेखनीय रही है। मध्य भारत प्रांत में 2481 स्थानों पर 3842 शाखाएं संचालित हो रही हैं, जबकि मालवा प्रांत में 3292 स्थानों पर 5049 शाखाएं और महाकौशल में 2141 स्थानों पर 3078 शाखाएं सक्रिय हैं। इस प्रकार तीनों प्रांतों को मिलाकर प्रदेश में लगभग 7900 से अधिक स्थानों पर 12,000 से अधिक शाखाएं संचालित हो रही हैं। साप्ताहिक मिलन और संघ मंडलियों के माध्यम से भी संगठन की जड़ें गहरी हुई हैं। मध्य भारत में 736, मालवा में 1961 और महाकौशल में 918 साप्ताहिक मिलन संचालित हैं।
सेवा बस्तियों से समाज के अंतिम व्यक्ति तक
संघ के सेवा कार्यों का सबसे प्रभावी आयाम राज्य की सेवा बस्तियों में दिखाई देता है। मध्य भारत में 1013 सेवा बस्तियों में से 970 में सेवा कार्य, मालवा में 672 सेवा कार्ययुक्त बस्तियां और महाकौशल में भी व्यापक सेवा गतिविधियां संचालित हैं। इन सबको मिलाकर प्रदेश में हजारों सेवा परियोजनाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन और संस्कार के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं।
विशेष रूप से नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और गौसंवर्धन जैसे विषयों पर स्थानीय स्तर पर अभिनव प्रयोग हुए हैं। ग्वालियर, शिवपुरी, सीहोर जैसे क्षेत्रों में नशामुक्ति अभियान, प्लास्टिक मुक्त अभियान और ‘एक घर-एक रोटी’ जैसे उपक्रम समाज को सीधे जोड़ने में सफल रहे हैं। यह कार्य पंचपरिवर्तन के मूल भाव स्व, समाज, पर्यावरण, कुटुंब और राष्ट्र को व्यवहार में उतारने का उदाहरण है।
प्रशिक्षण और व्यक्तित्व विकास से सक्षम कार्यकर्ता निर्माण
संघ कार्य का आधार उसके प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं। मध्य भारत में 179 प्रारंभिक वर्गों में 8021 स्वयंसेवक और 61 प्राथमिक वर्गों में 3485 स्वयंसेवकों ने प्रशिक्षण लिया। मालवा में 1712 और महाकौशल में भी बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने विभिन्न प्रशिक्षण वर्गों में सहभागिता की। प्रदेशभर में हजारों स्वयंसेवक संघ शिक्षा वर्गों से प्रशिक्षित होकर समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं। मध्य भारत प्रांत के प्रांत संघचालक अशोक पांडेय कहते हैं, “यह प्रशिक्षण सिर्फ संगठनात्मक होने तक सीमित नहीं है, वास्तव में ये सभी चरित्र निर्माण और सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम हैं।”
शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम में अभूतपूर्व जनभागीदारी
संघ के शताब्दी वर्ष में आयोजित कार्यक्रमों ने समाज में नई चेतना का संचार किया है। मध्य भारत में 2124 स्थानों पर विजयादशमी उत्सव और 1818 स्थानों पर पथ संचलन हुए, जबकि मालवा में 1489 उत्सवों में 4 लाख से अधिक स्वयंसेवक गणवेश में शामिल हुए। महाकौशल में भी 3138 स्थानों पर कार्यक्रमों में लगभग 1.78 लाख स्वयंसेवकों की सहभागिता रही। तीनों प्रांतों को मिलाकर देखें तो लाखों स्वयंसेवकों की सहभागिता ने यह स्पष्ट किया कि संघ अब एक व्यापक जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है।
हिंदू सम्मेलन से सामाजिक एकता का संदेश
शताब्दी वर्ष का सबसे प्रभावी कार्यक्रम “हिंदू सम्मेलन” रहे। मध्य भारत में 1569 सम्मेलनों में 52 लाख से अधिक लोग जुड़े, मालवा में 70 लाख से अधिक और महाकौशल में 23 लाख से अधिक सहभागिता हुई। इस प्रकार पूरे प्रदेश में लगभग 1.45 करोड़ से अधिक नागरिकों की सहभागिता ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया हैं। उल्लेखित है कि इन सम्मेलनों में प्रभात फेरियां, कलश यात्राएं, सहभोज, सांस्कृतिक कार्यक्रम और संतों का मार्गदर्शन इन सभी ने सामाजिक समरसता को मजबूत किया। खास ये रहा कि इनमें महिलाओं और युवा वर्ग की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली।
गृह संपर्क अभियान से हर घर तक पहुंच
गृह संपर्क अभियान संघ के शताब्दी वर्ष की सबसे व्यापक पहल रही। मध्य भारत में 27 लाख, मालवा में 32 लाख और महाकौशल में 43 लाख से अधिक परिवारों तक संपर्क किया गया। इस प्रकार पूरे मध्य प्रदेश में एक करोड़ से अधिक परिवारों तक संघ कार्य का परिचय पहुंचा। लगभग 80 हजार से अधिक स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर संवाद किया। अशोक पांडेय बताते हैं, “श्रीराम मंदिर निर्माण के वक्त भी स्वयंसेवकों ने व्यापक गृहसंपर्क अभियान चलाया था, निश्चित तौर पर पहले भी और इस बार भी ये गृह संपर्क अभियान सामाजिक संवाद, विश्वास निर्माण और वैचारिक स्पष्टता का एक अभूतपूर्व उदाहरण बने हैं।”
समाज नेतृत्व के बीच नई पीढ़ी का जुड़ाव
मालवा प्रांत में 1.88 लाख युवाओं की सहभागिता वाले कार्यक्रम, महाकौशल में 50 हजार से अधिक युवाओं की भागीदारी और मध्य भारत में चल रहे बाल गोकुलम, अध्ययन केंद्र और युवा संवाद ये सभी संकेत देते हैं कि नई पीढ़ी तेजी से संघ कार्य से जुड़ रही है। युवा संगम, व्याख्यान, युवा संसद और उद्यमिता मंच जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं में राष्ट्रबोध और नेतृत्व क्षमता का विकास किया है।
इसी तरह से सामाजिक सद्भाव बैठकों और प्रमुखजन गोष्ठियों के माध्यम से समाज के प्रबुद्ध वर्ग को जोड़ने का कार्य भी प्रभावी रहा। मालवा में 181 बैठकों में 10 हजार से अधिक समाज प्रमुख शामिल हुए, वहीं मध्य भारत में 193 गोष्ठियों में 17 हजार से अधिक प्रमुखजन जुड़े। दरअसल, इन कार्यक्रमों ने समाज के विभिन्न वर्गों संत, बुद्धिजीवी, महिला शक्ति और पेशेवर वर्ग को एक मंच पर लाकर समरस समाज की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।
सेवा से संगठन विस्तार और संगठन से समाज परिवर्तन
मध्य प्रदेश के तीनों प्रांतों मध्य भारत, मालवा और महाकौशल के समेकित आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि संघ का कार्य अब बहुआयामी और समाजव्यापी हो चुका है। शाखाओं का विस्तार, सेवा कार्यों की व्यापकता, करोड़ों लोगों तक पहुंचते कार्यक्रम और युवाओं की बढ़ती भागीदारी, ये सभी संकेत हैं कि संघ का शताब्दी वर्ष वास्तव में समाज परिवर्तन का अभियान बन गया है।
पंचपरिवर्तन के लक्ष्य स्व की जागृति, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्य अब सिर्फ विचार करने तक सीमित नहीं दिखते, ये सभी व्यवहार में उतरते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में यही आशा रखनी चाहिए कि आने वाले समय में यह संगठित और जागृत समाज ही राष्ट्र निर्माण की दिशा को और अधिक सशक्त बनाएगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
