मीरजापुर, 05 अप्रैल (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले में गंगा किनारे जलीय जीवों की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से घोषित कछुआ सेंक्चुअरी आज खुद असुरक्षित नजर आ रही है। प्रयागराज के मेजा क्षेत्र के कोठरी गांव से मीरजापुर के छानबे क्षेत्र के नदिनी तक करीब 22 किलोमीटर इलाके को ईको सेंसिटिव जोन घोषित किया गया है, लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट दिखाई दे रही है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस पूरे क्षेत्र में खनन, परिवहन और किसी भी प्रकार की अवांछित गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध है। इसके बावजूद गोगांव से गौरा गांव तक लगभग 8 किलोमीटर क्षेत्र खनन और परिवहन माफियाओं का अड्डा बना हुआ है। गंगा की तराई में 24 घंटे बालू खनन का खेल जारी है, जबकि पानी में जाल बिछाकर कछुओं और मछलियों का शिकार खुलेआम हो रहा है।
करीब 10 माह पूर्व राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण और पर्यावरण-वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अधिकारियों ने स्थलीय निरीक्षण किया था। गंगा किनारे सैकड़ों गड्ढे देखकर अधिकारियों ने कड़ी नाराजगी जताई और संबंधित अधिकारियों को फटकार लगाई थी। निगरानी चौकी, वॉच टावर और मोटर बोट से निगरानी के निर्देश भी दिए गए थे।
कछुआ सेंक्चुअरी की सुरक्षा के लिए हाल ही में शासन स्तर से 37 लाख रुपये का बजट भी जारी किया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं। दो साल पहले इस सेंक्चुअरी को काशी वन्य जीव प्रभाग वाराणसी से स्थानांतरित किया गया, लेकिन अब तक वहां का स्टाफ मीरजापुर में तैनात नहीं किया गया, जो सवाल खड़े करता है।
वन्यजीव प्रेमियों और ‘गंगा वारियर’ समूहों का कहना है कि यदि कछुआ सेंक्चुअरी की जिम्मेदारी कैमूर वाइल्डलाइफ डिवीजन को सौंपी जाए तो बेहतर निगरानी संभव हो सकती है। वर्तमान में नोडल विभाग की उदासीनता के चलते हरगढ़ से खैरा गांव तक शिकारी सक्रिय हैं और गंगा का पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में पड़ता जा रहा है।
इस संबंध में जिलाधिकारी पवन कुमार गंगवार ने बताया कि एडीएम वित्त, वन विभाग और खनन विभाग की संयुक्त टीम गठित कर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, लेकिन असर अभी जमीन पर नहीं दिख रहा। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में इस ईको सेंसिटिव जोन से जलीय और वन्य जीवों का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / गिरजा शंकर मिश्रा
